Tunnel Rescue -408 घंटों में 21 एजेंसियों वाले ‘वॉर रूम’ ने ऑगर से लेकर रैट माइनर्स को दी थी झटपट मंजूरी

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देहरादून, उत्तरकाशी की सिल्क्यारा टनल में फंसे 41 मजदूरों को बचाने के लिए केंद्र सरकार में एक ऐसा ‘वॉर रूम’ तैयार किया गया था, जिसने 408 घंटे तक लगातार काम किया है। सरकारी महकमों को लेकर वह सोच, यहां तो किसी भी योजना से जुड़ी फाइलें, कछुआ गति से आगे बढ़ती हैं, सिल्क्यारा सुरंग के मामले में बदल गई।

Uttarkashi tunnel rescue have set a landmark of perfect coordination and perfect technical planning. Thus ended up on a perfectly happy ending for everyone associated as all the lives were saved and went back to their families. Central govt and state govt. specially Cm Dhami made a coordination room for his workings there only. He operated from the site and were present to receive everyone personally along side Gen. V K Singh. This war room worked nonstop for more than 408 hours and worked on every possible ways of rescue support.

केंद्र और राज्य सरकार को मिलाकर 21 से अधिक एजेंसियां, रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटी रहीं। ये सभी एजेंसियां, प्रधानमंत्री कार्यालय और केंद्रीय गृह मंत्रालय के साथ मिलकर त्वरित गति से जरूरी निर्णय लेती रहीं। बात चाहे अमेरिकी ड्रिल मशीन ‘ऑगर’ को सुरंग में उतारने की हो या विपरित परिस्थितियों में खुदाई के लिए ‘रैट माइनर्स’ की मदद लेना, ऐसे किसी भी मामले को हरी झंडी, महज साठ मिनट से भी कम समय में दे दी जाती थी। खास बात ये रही कि इन एजेंसियों के बीच में जो तालमेल रहा, वह एक उदाहरण बन गया है।

केंद्र सरकार में इस टनल रेस्क्यू ऑपरेशन से जुड़े रहे एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, देखिये ये अभी तक का एक बड़ा अभियान था। यहां पर 41 लोगों की जिंदगी का सवाल था। जब मजदूरों के सुरंग में फंसने की सूचना मिली थी, पीएमओ और गृह मंत्रालय तभी सक्रिय हो गया था। बिना किसी देरी के केंद्रीय एजेंसियों और राज्य सरकार के विभागों के बीच बैठक हुई।

महज 24 घंटे के भीतर केंद्रीय ‘वॉर रूम’ तैयार कर दिया गया। इसके बाद 41 मजदूरों को बचाने की जंग शुरू हो गई। पीएम मोदी के प्रधान सचिव पीके मिश्रा और कैबिनेट सेक्रेटरी राजीव गौबा, गृह सचिव अजय भल्ला, एनडीएमए के सदस्य सैयद अता हसनैन, एनडीआरएफ चीफ और उत्तराखंड सरकार के मुख्य सचिव समेत दर्जनभर से अधिक विभागों के हेड ने सुरंग से 41 मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकालने की योजना बनाई।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान, सीमा सड़क संगठन (बीआरओ), टेलीकम्यूनिकेशन विभाग, आर्मी, एयरफोर्स, तेल और प्राकृतिक गैस निगम लिमिटेड, सतलुज जल विद्युत निगम लिमिटेड, रेल विकास निगम लिमिटेड, राष्ट्रीय राजमार्ग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर विकास निगम लिमिटेड, एनआईडीएम और टीएचडीसी इंडिया लिमिटेड जैसी एजेंसियों के प्रमुखों के साथ बातचीत की गई। उक्त सभी एजेंसियों को अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपी गईं। कई एजेंसियों को एक टीम के तौर पर जरूरी निर्णय लेने के लिए फ्री हैंड दिया गया।

यही वजह रही कि अमेरिकी ड्रिल मशीन ‘ऑगर’ को सुरंग तक लाने में देरी नहीं हुई। सिलक्यारा सुरंग में फंसे 41 श्रमिकों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए युद्ध स्तर पर काम शुरू हुआ। जब ‘ऑगर’ मशीन टूट गई, तो सेना को रेस्क्यू के काम में लगाया गया। इसके बाद भूवैज्ञानिकों, जियो-मैपिंग विशेषज्ञ और एनआईडीएम के विशेषज्ञों से बात की गई। खास बात ये रही कि जब अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ अर्नाल्ड डिक्स को बुलाने की बात हुई, तो इस प्रपोजल को चंद मिनट में मंजूरी दे दी गई। अर्नाल्ड डिक्स के साथ छह अन्य टनल एक्सपर्ट भी मौके पर पहुंचे थे। ऑस्ट्रेलियाई नागरिक अर्नाल्ड डिक्स, जिनेवा स्थित इंटरनेशनल टनलिंग एंड अंडरग्राउंड स्पेस एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं। पेशे से वह एक बैरिस्टर, वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग के प्रोफेसर हैं। इतना ही नहीं, वॉर रूम की तरफ से ऑस्ट्रेलियाई विशेषज्ञ को भी फ्री हैंड दिया गया। उनकी मदद के लिए सभी एजेंसियों को लगाया गया।

सीनियर कंसलटेंट, एनआईडीएम विनोद दत्ता भी मानते हैं कि इस अभियान में लगी तमाम एजेंसियों के बीच गजब का तालमेल रहा है। सुरंग तक मशीन कैसे आएंगी। हैवी व्हीकल के लिए सड़क मार्ग को तैयार कौन करेगा, इस तरह के दूसरे कार्यों के लिए वॉर रूम की तरफ से राज्य स्तर पर एक टीम गठित की गई थी।

एनडीएमए के सदस्य सैयद अता हसनैन ने मंगलवार को कहा, सेफ्टी के साथ रेस्क्यू अभियान चलाया गया है। बहुत बाधाएं आई हैं, लेकिन इसके बावजूद हम कामयाबी के करीब पहुंच गए हैं। पीएमओ ने सभी एजेंसियों और उनके विशेषज्ञों का हौसला बढ़ाया है। राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ), राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (एसडीआरएफ), भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) और सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) के 150 से ज्यादा कर्मियों की टीम दिन-रात लगी रही।

सुरंग में फंसे मजदूरों के लिए वरदान बनी रैट होल माइनिंग, क्यों लगा था इस पर प्रतिबंध?

नई दिल्ली/देहरादून, 28 नवंबर (वेब वार्ता)। उत्तरकाशी की निर्माणाधीन सिलक्यारा सुरंग में 17 दिन से फंसे 41 श्रमिकों के लिए मंगलवार का दिन अहम साबित हुआ। बचाव अभियान में लगी टीम को आज सफलता मिल गई है। फंसे मजदूरों को निकालने के लिए रैट माइनिंग पद्धति द्वारा सुरंग के अंदर मैन्युअल ड्रिलिंग की गई। रैट माइनर्स द्वारा यह ड्रिलिंग 57 मीटर तक की गई।

पहले जानते हैं घटना कैसे हुई थी?

दरअसल, 12 नवंबर 2023 की अल सुबह 05.30 बजे सिलक्यारा से बड़कोट के बीच बन रही निर्माणाधीन सुरंग में धंसाव हो गया। सुरंग के सिल्क्यारा हिस्से में 60 मीटर की दूरी में मलबा गिरने के कारण यह घटना हुई। 41 श्रमिक सुरंग के अंदर सिलक्यारा पोर्टल से 260 मीटर से 265 मीटर अंदर रिप्रोफाइलिंग का काम कर रहे थे, तभी सिलक्यारा पोर्टल से 205 मीटर से 260 मीटर की दूरी पर मिट्टी का धंसाव हुआ और सभी 41 श्रमिक अंदर फंस गए।

घटना की सूचना तुरंत राज्य और केंद्र सरकार की सभी संबंधित एजेंसियों को दी गई और उपलब्ध पाइपों के जरिए सुरंग में फंसे हुए श्रमिकों को ऑक्सीजन, पानी, बिजली, पैक भोजन की आपूर्ति के साथ बचाव कार्य शुरू किया गया। फंसे हुए श्रमिकों से वॉकी-टॉकी के माध्यम से भी संचार स्थापित किया गया है। श्रमिकों को शीघ्र बचाव के लिए कई बीते 16 दिनों में कई उपाय किए गए हैं।

क्या है रैट होल माइनिंग?

रैट-होल माइनिंग एक ऐसी पद्धति है जिसमें कुछ खनिक कोयला निकालने के लिए संकरे बिलों में जाते हैं। हालांकि, यह पद्धति विवादित और गैर-कानूनी भी है। दरअसल, यह प्रथा पूर्वोत्तर के राज्य मेघालय में प्रचलित थी। खनिक गड्ढे खोदकर चार फीट चौड़ाई वाले उन संकरे गड्ढों में उतरते थे जो, जहां केवल एक व्यक्ति की जगह होती है। वे बांस की सीढ़ियों और रस्सियों का इस्तेमाल करके नीचे उतरते थे, फिर गैंती, फावड़े और टोकरियों आदि का उपयोग करके मैन्युअल रूप से कोयला निकालते थे।

विवादित क्यों है यह पद्धति?

इस तरीके से होने वाली खुदाई से सुरक्षा खतरे उत्पन्न हो गए। ऐसा इसलिए क्योंकि खनिक सुरक्षा उपाय किए बिना गड्ढे में उतर जाते थे और कई बार हादसों का शिकार हो जाते थे। ऐसे कई मामले भी आए जहां बरसात में रैट होल माइनिंग के कारण खनन क्षेत्रों में पानी भर गया, जिसके चलते श्रमिकों की जानें गईं। यही कारण है कि साल 2014 में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने मेघालय में इस पद्धति से होने वाली खुदाई पर पाबंदी लगा दिया।

सिलक्यारा में रैट माइनर्स कैसे काम कर रहे हैं?

सिलक्यारा बचाव अभियान में लगातार विफल होते विकल्पों के बीच सोमवार को छह सदस्यीय रैट माइनर्स की टीम को तैनात किया गया। ऑगर मशीन के फेल होने के बाद हाथ से खोदाई कराने का फैसला किया गया। श्रमिकों की कुशल टीम रैट होल माइनिंग पद्धति का इस्तेमाल करके हाथ से मलबा हटाने का काम किया।

एक विशेषज्ञ ने बताया कि एक आदमी खुदाई करता है, दूसरा मलबा इकट्ठा करता है और तीसरा उसे बाहर निकालने के लिए ट्रॉली पर रखता है। विशेषज्ञ मैन्युअली मलबे को हटाने के लिए 800 मिमी पाइप के अंदर काम कर रहे हैं। कहा गया कि इस दौरान एक फावड़ा और अन्य विशेष उपकरण का उपयोग किया जा रहा है। ऑक्सीजन के लिए एक ब्लोअर भी लगा है।

इस प्रकार की ड्रिलिंग काफी मेहनत वाला काम है और खुदाई करने वालों को बारी-बारी से खुदाई करनी पड़ती है। हालांकि, ये खनिक ऐसे कामों के लिए कुशल हैं।

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