The New Labour Laws received an overwhelming response from Trade Unions across the country. only a few from kerala and Karnataka alongside bengal communist circles protesting strikes. But majorly Trade Unions are happy with the central policies. ‘श्रम कानूनों में कई सकारात्मक प्रावधान’, ट्रेड यूनियन की हड़ताल के बीच सरकार के समर्थन में आए कई संगठन
नई दिल्ली/मुंबई, नए श्रम कानूनों के विरोध में ट्रेड यूनियनों समेत कई संगठनों ने गुरुवार को हड़ताल का आह्वान किया है। इसी बीच, कुछ संगठन से जुड़े नेता और कानूनी सलाहकार सरकार की तरफ से लाए गए कानूनों का समर्थन कर रहे हैं।

ट्रेड यूनियन कोऑर्डिनेशन सेंटर (टीयूसीसी) के राष्ट्रीय महासचिव एसपी तिवारी ने हड़ताल को गलत ठहराया। उन्होंने कहा, “ट्रेड यूनियन मजदूरों को सुविधाएं और उनके अधिकारों के लिए काम करती है। लंबे समय से मांग होती रही है कि सभी को न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा मिलनी चाहिए। इसी के लिए सरकार नियम लेकर आई है, इसलिए यह हड़ताल गलत है।”
उन्होंने आरोप लगाया कि सिर्फ राजनीति के लिए यह हड़ताल हो रही है। सरकार का फैसला सराहनीय है, लेकिन राजनैतिक रूप से जुड़े ट्रेड यूनियन ही इसका विरोध कर रहे हैं। शिव प्रसाद तिवारी ने कहा कि राजनीतिक दलों के आरोप बिल्कुल निराधार हैं। पिछले 10 सालों में कई हड़तालों से राजनीतिक दलों ने मजदूर वर्ग का काफी नुकसान कराया है।

भारतीय फॉरवर्ड सीमेन यूनियन के कानूनी सलाहकार एडवोकेट अक्षय बिरवाडकर ने कहा कि सरकार की ओर से लाए गए श्रम कानूनों में कई सकारात्मक प्रावधान किए गए हैं। यह विशेष रूप से देश के असंगठित क्षेत्र के करोड़ों मजदूरों के हित में है। उन्होंने कहा कि ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका प्रयास’ के मंत्र के साथ सरकार सभी को साथ लेकर चल रही है। ऐसे में बिना ठोस आधार के विरोध करना देशहित के विरुद्ध प्रतीत होता है।
अक्षय बिरवाडकर ने कहा, “वर्ष 2019 से 2025 के बीच इस विषय पर लगातार चर्चा होती रही। 2019 में विधेयक को संसद में पेश किया गया, बाद में पारित किया गया और 2025 में लागू किया गया। राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन पूरे देश में एक समान होना चाहिए और कोई भी राज्य उससे कम वेतन न दे, यह एक महत्वपूर्ण प्रावधान है। साथ ही महिला और पुरुष को समान कार्य के लिए समान वेतन मिले तथा ओवरटाइम का भुगतान दोगुनी दर से हो, इन सभी बातों को नए कानून में शामिल किया गया है।”

उन्होंने कहा कि कुछ राजनीतिक दल अपने हित साधने के लिए श्रमिकों को भ्रमित कर रहे हैं और देश के शांतिपूर्ण वातावरण को प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं।
अक्षय बिरवाडकर ने यह भी कहा कि रोजगार होंगे तभी मजदूर होंगे और मजदूर होंगे तभी उनके अधिकारों की बात होगी। आज सरकारी नौकरियों की संख्या पहले की तुलना में कम है और बड़ी संख्या में लोग असंगठित या नए उभरते क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं। ऐसे में इन नए क्षेत्रों को कानूनी दायरे में लाना जरूरी था। ईपीएफओ, ईएसआई और अन्य सामाजिक सुरक्षा प्रावधानों के तहत इन मजदूरों को लाना एक सराहनीय कदम है, जो केंद्र सरकार की ओर से उठाया गया।
भारत बंद पर बंटी ट्रेड यूनियन : एनएफआईटीयू ने हड़ताल से किया किनारा, सरकार की नीतियों का समर्थन
बेंगलुरु, एक ओर जहां 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियन और किसान संगठन केंद्र सरकार की कथित ‘मजदूर विरोधी’ नीतियों के खिलाफ गुरुवार को राष्ट्रव्यापी हड़ताल और भारत बंद पर हैं, वहीं कर्नाटक से नेशनल फ्रंट ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (एनएफआईटीयू) ने इस हड़ताल से खुद को अलग कर लिया है। संगठन के अध्यक्ष वी. वेंकटेश ने साफ कहा कि इस हड़ताल के पीछे सिर्फ राजनीति है और उनकी यूनियन इसमें हिस्सा नहीं लेगी।
वी. वेंकटेश ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा लाए गए सभी श्रम सुधार मजदूरों के हित में हैं। हमने सभी संबद्ध ट्रेड यूनियनों को निर्देश दिया है कि वे हड़ताल में भाग न लें। जो यूनियनें हमारे साथ हैं, वे गुरुवार को काम करेंगी। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक दल, खासकर वामपंथी दल, इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दे रहे हैं।
एनएफआईटीयू अध्यक्ष ने केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए चार नए लेबर कोड का स्वागत किया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मांडविया और सचिव वंदना गुरनानी की सराहना करते हुए कहा कि ये कोड मजदूरों के हित में हैं। वेतन संहिता (वेज कोड) लंबे समय से लंबित थी, जिसे अब पूरे देश में एक समान रूप से लागू किया गया है। इसे उन्होंने सकारात्मक कदम बताया।
वेंकटेश ने 16 जनवरी को केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मांडविया से हुई अपनी मुलाकात का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उन्होंने मंत्री से भविष्य निधि (प्रोविडेंट फंड) की सीमा बढ़ाने का अनुरोध किया है।
उन्होंने फिक्स्ड-टर्म ट्रेनी व्यवस्था का भी समर्थन किया। उनके मुताबिक पहले प्रशिक्षण अवधि पूरी होने के बाद ट्रेनी कर्मचारियों को हटा दिया जाता था, लेकिन अब केंद्र सरकार ने व्यवस्था की है कि प्रशिक्षण पूरा करने वाले कर्मचारियों को ग्रेच्युटी का लाभ मिलेगा। इसे उन्होंने मजदूरों के लिए बड़ा लाभ बताया।
हड़ताल के सवाल पर वेंकटेश ने कहा, “हमें राजनीति में क्यों पड़ना चाहिए? मंत्री ने खुद कहा है कि हम टेबल पर बैठकर चर्चा करें। जब बातचीत का रास्ता खुला है तो हड़ताल की क्या जरूरत?”
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि केंद्रीय मंत्री ने ट्रेड यूनियनों को बैठक के लिए बुलाया था, लेकिन कुछ यूनियनें बैठक से बाहर चली गईं।
वेंकटेश ने दावा किया कि सभी सेक्टर हड़ताल में शामिल नहीं होंगे। उनके अनुसार कई सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम और निजी उद्योग हड़ताल में भाग नहीं लेंगे। उन्होंने कहा कि कुछ मजदूर जरूर हड़ताल में जाएंगे, खासकर वामपंथी दलों से जुड़े संगठन, लेकिन व्यापक समर्थन नहीं मिलेगा।
उधर, संयुक्त केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच ने गुरुवार को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया है। इन संगठनों का दावा है कि केंद्र की नीतियां मजदूर विरोधी हैं। गुरुवार को बुलाए गए भारत बंद से बैंकिंग, बीमा, बिजली, परिवहन, स्वास्थ्य, शिक्षा, गैस और जल आपूर्ति जैसी सेवाओं पर आंशिक असर पड़ सकता है।