In the exclusive series of Achievers we present to you Ashish Kashyap story of a Delhi man with Exceptional courage and extreme Inspiration that makes you believe in Humanity and selfless services again. Ashish Kashyap who fearlessly served and performed last rituals for more than 70,000 unclaimed dead-bodies found in Delhi NCR region within 14 years and this braveheart is going strong popularly known as Bhagirath of Delhi also a Paranormal Investigator and healer.
कौन है ये 70,000 से भी ज्यादा लावारिस लाशों का एक अनजाना वारिस जिसके हठ ने खोल दिए भटकती आत्माओं के लिए मुक्ति मोक्ष के द्वार?

आशीष कश्यप जब पहली बार मेरे सामने आकर बैठे तो हमारी बातचीत सामान्य रूप से शुरू हुई थी लेकिन जैसे जैसे ये आगे बढ़ती गई लगा मानवीयता , संवेदना, दुःख, भय, साहस, शौर्य और रहस्य की ऐसी दुनिया के द्वार खुलते गए जिन्होंने आश्चर्यचकित कर के रख दिया। दिल्ली के युवा आशीष कश्यप की भावनात्मक, सम्मानजनक और प्रेरणादायक एक सामाजिक-प्रेरक यात्रा

दिल्ली का एक आम सा दिखने वाला युवक जिस के चेहरे पर असीम शांति और आंखों में बेहद तेज, बातों में आत्मविश्वास और आध्यात्म । वो बहुत शांत स्वभाव से हर प्रश्न का उत्तर देते हैं। महज 31 साल की उम्र में आशीष वो इंसान बन चुके हैं हासिल कर चुके उस अमाल मुकाम पर पहुंच चुके है जिसके लिए लोग दिन रात भागे फिरते हैं। वो सम्मान और सिद्धि उन्हें अपने उस दैविक कार्य के लिए मिली है जिसे सुन कर भी आप के दिल की धड़कन तेज़ हो जाए।
आशीष कश्यप की कहानी आपको कहीं रोमांच तो कहीं आंखों को आंसुओं से भिगो देती है आशीष कश्यप अब एक सफल इंटरनेशनल पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर हैं लेकिन निगम बोध पर वो आज भी अस्थिफूल इक्ट्ठा करते हैं।
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आखिर ये आशीष कश्यप हैं कौन? जिन्हें दुनिया ढूंढ रही है लेकिन वो लाखों की फीस भी ठुकरा देते हैं और अपने कर्तव्य और सत्य का पथ नहीं छोड़ते।
जहाँ समाज रुक जाता है, वहाँ एक इंसान निर्भय होकर आगे बढ़ता है वो है आशीष कश्यप। जी हां आशीष कश्यप वही हैं जो कोरोना काल में “आज तक न्यूज” की एक रिपोर्ट के माध्यम से दुनिया के सामने आए थे। कोविड 19 में शमशान भूमि स्थलों का वो भयावह मंजर जब रात के अंधेरों में लोग अपने ही मृतक परिवारजनों को लावारिस यहां वहां फेंक फेंक कर भाग रहे थे। लाश जिसका ना कोई नाम ना पहचान बस स्त्री या पुरुष। और संक्रमण ऐसा की ज़रा से संपर्क से खुद की मृत्यु काल को खुला निमंत्रण । लेकिन उस समय एक शख्स जो चुपचाप इन लावारिसों को भी बिना खौफ के, स्वजन जैसी अंतिम विदाई देने का बंदोबस्त करते दिखा वो हैं आशीष कश्यप। इन्होंने मौत के बाद भी किसी को अकेला नहीं छोड़ा।

“पैसे नहीं, पुण्य कमाने वाला इंसान”- “लावारिस देहों का सच्चा वारिस बन उनके दर्द को अपनाने वाले आशीष कश्यप ने एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में महज 16 साल की उम्र में अपना यह सफर शुरू किया था। पहली बार इस देवोत्थान सेवा समिति की यात्रा का हिस्सा बने थे। 2012 से आज 14 वर्ष बीत चुके हैं और आशीष कश्यप अब एक सफल इंटरनेशनल पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर हैं लेकिन निगम बोध पर वो आज भी अस्थिफूल इक्ट्ठा करते हैं । वो कहते हैं कि अपनी पहचान गंवा चुके शरीर बेशक राख हो जाते हैं लेकिन उनकी आत्माएं अपनी कहानी अपनी जुबानी इन्हें सुनाती हैं ” उनके दर्द को महसूस करने, उन्हें देखने की वो त्रिकाल दृष्टि का आशीर्वाद आशीष को 6 साल पहले मिला । ये उनके साहस, सच्चाई , पुण्य कर्मों और यकीन की यात्रा है।

“श्मशान में जलती चिताओं के बीच जिंदा इंसानियत”
इस संसार में बहुत से लोग स्वयं को धार्मिक कहते हैं, पूजा-पाठ करते हैं, दान-पुण्य की बातें करते हैं, परंतु बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो बिना किसी दिखावे, बिना किसी अपेक्षा और बिना किसी स्वार्थ के वास्तविक मानव सेवा को अपना धर्म बना लेते हैं आशीष कश्यप ऐसे ही एक असाधारण इंसान हैं, जिन्होंने बीते 14 वर्षों से समाज के सबसे उपेक्षित वर्ग – लावारिस मृतकों – के मोक्ष के लिए अपना जीवन समर्पित किया है, जिसके नाम से भी लोग डरते हैं, कतराते हैं या आंखें फेर लेते हैं।

जब कोई व्यक्ति इस दुनिया से जाता है, तो उसका अंतिम संस्कार केवल एक क्रिया नहीं बल्कि उसका अंतिम सम्मान होता है। दुर्भाग्यवश, हमारे समाज में ऐसे अनगिनत लोग हैं जो पहचान, परिवार, रिश्ते और सहारे के बिना मर जाते हैं। सड़कों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों या झुग्गियों में पड़े ये शव अक्सर प्रशासनिक औपचारिकताओं और सामाजिक उदासीनता के बीच अनदेखे रह जाते हैं। ऐसे में आशीष कश्यप उन लोगों के लिए देवदूत बनकर सामने आते हैं।
जहाँ सब पीछे हटते हैं, वहाँ आशीष आगे बढ़ते हैं

लावारिस शवों को उठाना, उनके अवशेष एकत्र करना, उन्हें श्मशान तक ले जाना, अंतिम संस्कार की तैयारी करना और पूरे विधि-विधान से उनका दाह-संस्कार हरिद्वार में विधि विधान से करना — यह सब कोई आसान काम नहीं है। यह कार्य न केवल शारीरिक रूप से कठिन है, बल्कि मानसिक और भावनात्मक रूप से भी बेहद चुनौतीपूर्ण है। सड़ते शव, दुर्गंध, समाज की बेरुखी और कई बार तिरस्कार — इन सबके बावजूद आशीष कश्यप वर्षों से यह सेवा निरंतर करते आ रहे हैं। उन्होंने कभी यह नहीं पूछा कि मरने वाला कौन था, किस धर्म का था, उसकी जाति क्या थी या उसका कोई अपना क्यों नहीं आया। उनके लिए केवल एक बात मायने रखती है — “मृत्यु के बाद भी इंसान को सम्मान मिलना चाहिए।”

बिना किसी शुल्क, बिना किसी प्रचार
आज के दौर में जहाँ सेवा भी कैमरे और सोशल मीडिया की मोहताज हो चुकी है, वहीं देवोत्थान सेवा समिति और आशीष कश्यप की सेवा पूरी तरह निस्वार्थ है। वे न तो किसी से पैसे लेते हैं, न चंदा मांगते हैं और न ही अपनी इस सेवा का ढिंढोरा पीटते हैं। अपने निजी संसाधनों से कफन, लकड़ी, पूजा सामग्री और अंतिम संस्कार से जुड़ा पूरा खर्च उठाते आएं है। सब स्थलों से अस्थिफूल एकत्र कर के कट्टों में भर कर शमशान में बने एक विशेष कक्ष में रखे जाते हैं और फिर इनका यात्रा आयोजन का कार्यक्रम निर्जला एकादशी से शुरू होता है जब बेहद भव्य स्तर पर अंतिम विदाई दी जाती है। उससे पहले हर अमावस्या पर इनके लिए पूजा एवं भोग भी बनवाया जाता है। श्राद्ध पक्ष के पहले शुक्रवार को दिल्ली में इन सैकड़ों कट्टों को ट्रक ट्रालियों में फूलों से सज्जित कर रखा जाता है और मंत्रोचारण, बाजे इत्यादि के साथ यह काफिला हरिद्वार रवाना होता है। इस यात्रा को दिल्ली एवं उत्तराखंड की सरकार और प्रशासन की कड़ी सुरक्षा में हरिद्वार कनखल के विशिष्ट सती घाट तक पहुंचाया जाता है जहां सम्मानजनक अस्थि विसर्जन के बाद पुरोहित क्रिया एवं हवन करवाते हैं। आशीष बताते हैं वह दिन सबके लिए बेहद भावुक कर देने वाला होता है आंसू नहीं रुकते । जो इस दुनिया से अनंत यात्रा पर चले गए जिन्हें याद करने के लिए स्मृति में रखने के लिए कोई नाम भी पता नहीं है उनकी विदाई करना भी ना जाने क्यों ह्रदय विद्यारक होता है। मन बार बार पूछता है कि हे विधाता उनकी ऐसी नियति क्यों ? ?

फिर यह संतोष होता है कि हम उनके लिए कुछ कर पाए। सबके लिए मुक्ति और मोक्ष की कामना करते हैं। आशीष सभी को यही संदेश देना चाहते हैं कि अपने परिवार को कभी ना छोड़िए। उनका मानना है कि यदि किसी की मदद करते समय बदले में कुछ लेने की इच्छा हो, तो वह सेवा नहीं, व्यापार बन जाती है। यही सोच उन्हें बाकी लोगों से अलग और ऊँचा बनाती है।
मानवता ही उनका धर्म है “मानवता का अंतिम संस्कार नहीं होता। बिना नाम, बिना पहचान—पर सम्मान के साथ विदाई हर जीवात्मा का अधिकार है”।
आशीष कश्यप किसी एक धर्म, पंथ विचारधारा या देश तक ही सीमित नहीं रही है आस पास के कई देशों की मीडिया ने इनके इस साहस से दैविक कार्य की खूब प्रशंसा की है फरवरी 2025 में पाकिस्तान से भी ये लावारिस शवों के 480 अस्थि कलश विसर्जन हेतु ले कर आए हैं जिसमें भारत सरकार और एंबेसी ने बड़ी सहयोगी भूमिका निभाई है। हर 4, 5 साल के बाद यह प्रक्रिया रखी जाती है। देवोत्थान सेवा समिति पूरे सम्मान और रीति-रिवाजों के साथ अंतिम संस्कार सुनिश्चित करते हैं। वे मानते हैं कि मृत्यु के बाद हर इंसान समान होता है और उसका अंतिम संस्कार उसका मौलिक अधिकार है।

समाज के लिए एक आईना
आशीष कश्यप का कार्य हमारे समाज के लिए एक आईना है, जो यह दिखाता है कि हम किस हद तक संवेदनहीन हो चुके हैं। जहाँ एक युवा अपने जीवन का बड़ा हिस्सा इस सेवा को दे रहा है, वहीं हम अक्सर ऐसी परिस्थितियों से मुंह मोड़ लेते हैं। उनका जीवन हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम सच में सभ्य समाज में जी रहे हैं?
परिवार और व्यक्तिगत जीवन का त्याग
इस सेवा के लिए आशीष को परिवार के विरोध का और अपने परिचितों की उपेक्षा का भी सामना करना पड़ा। लोगों के बर्ताव से उनका दिल भी बहुत दुखा लेकिन उन्होंने इस सेवा से मुंह नहीं मोड़ा । आशीष ने जीविका के लिए सरकारी सशस्त्र एनफोर्समेंट विभाग में नौकरी की लेकिन वहां भी उन्हें कुछ अधिकारियों की घृणा और विरोध का सामना करना पड़ा जिसके बाद उन्होंने त्यागपत्र दे दिया और अब अपना खुद का डिलीवरी सेवा का काम शुरू किया है। वो कहते है कि वो यह सेवा जारी रखेंगे।
सच्चे अर्थों में यही ‘ईश्वरीय सेवा’ है।

कहा जाता है कि नर सेवा ही नारायण सेवा है। आशीष कश्यप इस कहावत को जीते हैं। वे उन आत्माओं को शांति दिलाते हैं जिनके लिए कोई दीया मोमबत्ती जलाने वाला भी नहीं होता। आशीष कश्यप जैसे लोग किसी पुरस्कार या प्रशंसा के लिए काम नहीं करते, फिर भी समाज का यह कर्तव्य है कि ऐसे नायकों को पहचाने, उनका सम्मान करे और उनके कार्य को समर्थन दे। यदि प्रशासन, समाज और आम लोग मिलकर ऐसे प्रयासों में सहयोग करें, तो कोई भी व्यक्ति गुमनामी और अपमान के साथ इस दुनिया से विदा नहीं होगा।

दिल्ली का यह साधारण सा युवक असाधारण कार्य कर रहा है। आशीष कश्यप केवल शवों का अंतिम संस्कार नहीं करते, वे मानवता को जिंदा रखते हैं। वे हमें सिखाते हैं कि सच्ची सेवा वही है, जो अंधेरे में की जाए, बिना किसी तालियों के। समाज को उनका सहयोग करने आगे आना ही चाहिए।
ऐसे लोगों को नमन, ऐसे हाथों को सलाम और ऐसी आत्मा को शत-शत प्रणाम ।