Dirty Politics –Congress party is burning in revenge against Jyotiraditya Scindia in MP. For upcoming elections of Madhya Pradesh they want KP Singh to contest against Scindia . शिवपुरी से वीरेंद्र का हठ कांग्रेस को गले की फांस बन गई है। दिग्विजय सिंह के सामने जहां वीरेंद्र को दिया वादा है, वहीं केपी सिंह से रिश्तेदार भी है। केपी की बेटी दिग्विजय के भांजे को ब्याही हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की पत्रकारों से बातचीत में खुलासे के बाद साफ हो गया है कि पिछोर से कांग्रेस के छह बार से विधायक केपी सिंह को शिवपुरी से उम्मीदवार इसलिए घोशित किया गया था, जिससे ज्योतिरादित्य सिंधिया शिवपुरी से चुनाव नहीं लड़ने पाएं। क्योंकि केपी को एक कद्दावर और दबंग नेता के साथ सफल रणनीतिकार भी माना जाता है।

दरअसल सिंधिया अपने पिता माधवराव सिंधिया की विरासत संभालने के बाद गुना-शिवपुरी संसदीय क्षेत्र से ही सांसद रहे हैं। हालांकि वे 2019 में अपने ही नुमाइंदे केपी यादव से चुनाव हार गए थे। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस से बगावत का रुख किया और अपने निष्ठावान अनुयायी 22 विधायकों के साथ भाजपा में शामिल होकर मुख्यमंत्री कमलनाथ का तख्तापलट कर दिया।
इस बगावत के इनाम में उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाया गया और फिर केंद्रीय नागरिक एवं उड्डयन मंत्री भी बना दिया गया। 2020 में हुए उपचुनाव में उनके साथ आए ज्यादातर विधायक भी भाजपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीत गए। इनमें से ज्यादातर को प्रदेश सरकार में मंत्री भी बना दिया गया। लेकिन कांग्रेस आज भी इस रणनीति में लगी हुई है कि सिंधिया प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं बनने पाएं। इसी रणनीति का हिस्सा केपी सिंह को शिवपुरी से प्रत्याशी बनाया जाना रहा है।

दिग्विजय सिंह ने सोमवार को भोपाल में कहा कि पार्टी ने केपी सिंह की उम्मीदवारी का दांव ज्योतिरादित्य सिंधिया की संभावित उम्मीदवारी को भांपकर चला था। जब पार्टी शिवपुरी से मजबूत उम्मीदवार तलाष रही थी, तब केपी सिंह ने खुद उनसे मिलकर ज्योतिरादित्य सिंधिया अथवा उनही बुआ यषोधरा राजे सिंधिया के विरुद्ध लड़ने की सहमति दे दी थी।
सिंह ने कहा कि केपी ने शिवपुरी आकर बड़े राजनीतिक साहस का परिचय दिया है। मैं उनकी हिम्मत को दात देता हूं। केपी को मैं विद्यार्थी जीवन से ही जानता हूं, वे हिम्मत वाले कर्मठ नेता हैं। छह बार से लगातार विधायक होने के बावजूद शिवपुरी जिले और इस क्षेत्र में कांग्रेस का नेतृत्व वही कर रहे हैं। सिंह ने शिवपुरी से चुनाव लड़ने के लिए भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए कोलारस से वर्तमान विधायक वीरेंद्र रघुवंषी की भी तारीफ की।
उन्होंने कहा कि वीरेंद्र को मैं बहुत पहले से जानता हूं, वे एक जुझारू नेता हैं, कांग्रेस में सिंधिया के साथ राजनीतिक जीवन की षुरूआत करने वाले वीरेंद्र की कालांतर में जब सिंधिया से अनबन हो गई तब वे भाजपा में चले गए और कोलारस से विधायक भी बन गए। लेकिन सिंधिया के भाजपा में आने के बाद उनकी राजनीतिक यात्रा फिर संकट में पड़ गई और वे अपने घर में फिर से वापस आ गए। मैं इस बात को आधिकारिक रूप से कह रहा हूं कि मैंने और कमलनाथ जी ने उनसे शिवपुरी से टिकट देने का वादा किया था, लेकिन सिंधिया की संभावित उम्मीदवारी के चलते हमने केपी को शिवपुरी से उतारना उचित माना। इस कारण वीरेंद्र की नाराजगी स्वाभाविक है, हम उन्हें कोई न कोई लाभ देंगे।

दिग्विजय सिंह के इस बयान के बाद पूरे मध्यप्रदेष के राजनीतिक हलकों में एक बार फिर यह चर्चा गर्म हो पड़ी है कि केपी की पिछोर वापसी हो सकती है और वीरेंद्र को शिवपुरी से कांगेस टिकट दे सकती है ? इसी समय केपी सिंह की खनियाधाना में हुई सभा में केपी ने भी संषय भरा बयान देकर यह संदेह उत्पन्न कर दिया कि वे पिछोर से चुनाव लड़ सकते हैं।
अतएव धुंध और गहरा गई। केपी ने कहा था कि ‘मैं जिस सीट (शिवपुरी) पर चुनाव लड़ने गया हूं, वहीं से लडूंगा, इस बात की अभी कोई गारंटी नहीं है, इसलिए जब तक बी-फार्म नहीं मिल जाता तब तक मैं भी यह नहीं कह सकता हूं कि वहां से लड़ना पक्का है भी अथवा नहीं ?‘ सूत्रों के मुताबिक केपी ने दुविधा से भरा यह बयान दिग्विजय सिंह से मोबाइल पर हुई बातचीत के बाद दिया माना जा रहा हैं। दरअसल वीरेंद्र ने टिकट नहीं मिलने के बाद केंद्रीय नेतृत्व से लेकर सिंह और कमलनाथ पर पर्याप्त दबाव बनाया।
रघुवंशी समाज ने भी भोपाल में कमलनाथ से वीरेंद्र को टिकट देने की मांग की, अन्यथा रघुवंशी समाज के वोट नहीं मिलने की धमकी भी दी। इन सब कारणों के चलते दिग्विजय सिंह ने केपी सिंह को फोन पर शिवपुरी से दावेदारी पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया। बताते हैं केपी ने इसे ठुकरा दिया। इसलिए शिवपुरी से वीरेंद्र का हठ कांग्रेस को गले की फांस बन गई है। दिग्विजय सिंह के सामने जहां वीरेंद्र को दिया वादा है, वहीं केपी सिंह से रिश्तेदार भी है। केपी की बेटी दिग्विजय के भांजे को ब्याही हैं।

खैर, केपी और वीरेंद्र की षिवपुरी से दावेदारी के परिणाम में तीस अक्टूबर तक का समय लग सकता है, लेकिन इन दावेदारियों की वजह से समूचे ग्वालियर-अंचल में यह वातावरण जरूर बना है कि षिवपुरी की वर्तमान विधायक यषोधरा राजे सिंधिया ने इन्हीं कद्दावर नेताओं की दावेदारी की आषंकाओं के चलते बीमारी का बहाना बनाकर चुनाव नहीं लड़ने का निर्णय लिया और ज्योतिरादित्य सिंधिया चूंकि हार का मुख लोकसभा चुनाव में देख चुके हैं, इसलिए वे भी षायद विधानसभा का चुनाव लड़ने से पीछे हट गए।
दरअसल नरेंद्र सिंह तोमर और प्रहलाद पटेल समेत सात सांसदों को विधायक का टिकट दे दिए जाने के बाद यह लगभग तय लग रहा था कि सिंधिया शिवपुरी से चुनाव लड़ेंगे। लेकिन प्रदेष राजनीति के बड़े खिलाड़ी दिग्विजय सिंह ने केपी को दांव पर लगाकर महल को किनारे कर दिया।

मध्यप्रदेश की राजनीति में ऐसा अर्से बाद हुआ है कि शिवपुरी से अब न तो कोई सिंधिया परिवार का उम्मीदवार है और न ही उनका कोई नुमाइंदा मैदान में है। सच पूछा जाए तो भाजपा और कांग्रेस की शतरंजी चालोें से आखिर में सिंधिया को घाटा ही हुआ है। 2018 के विधानसभा के चुनाव में सिंधिया के 34 में से 22 उम्मीदवार थे, जो अब घटकर 13 रह गए हैं। सिंधिया के राजनीतिक वर्चस्व के लिए ऐसे हालातों का निर्माण भविश्य में एक बड़ी चुनौती के रूप में पेष आ सकते हैं।