Himachal Update -संपत्तियों का सही इस्तेमाल

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इमारतों की किफायत में सुशासन की टोह लेती सुक्खू सरकार ने शिमला के छह कार्यालयों को टूटीकंडी कॉम्पलेक्स में शिफ्ट कर दिया। ये कार्यालय किराए के भवनों में चल रहे थे। पूरे प्रदेश में सरकारी कार्यालयों के नीचे दबी जमीन या निजी भूमि में बसे कार्यालयों की जमीर में कुछ तो किफायत हो। दरअसल हिमाचल में सरकारी इमारतों की अपनी होड़ बेपरवाह और लापरवाह है और इसलिए बजट की मुद्रा में अनावश्यक विस्तार ने अपना मूल्यांकन ही नहीं किया। Good vision and governance strategies can change the fate of the state.

एक नीति के तहत अगर तेजी से खुलते कार्यालय निजी निवेश की संस्तुति में परवान चढ़ते, तो भी सरकार पैसा बचाने के साथ-साथ रोजगार दे सकती थी। हिमाचल में सरकारी कार्यालयों ने अपनी हेकड़ी में खजाने का दुरुपयोग ही किया और यह भी इसलिए कि हर विभाग अब निर्माण की मशीनरी है। इससे सार्वजनिक भूमि का दुरुपयोग और अधिकारियों के निरंकुश इरादों से धन को व्यर्थ किया जाने लगा है।

ऐसे में समूचे प्रदेश की संपत्तियों का डाटा बनाकर इनके सही इस्तेमाल, रखरखाव व विस्तार का संाचा बनाया जाए, तो अनावश्यक खर्च से बचा जा सकता है। इसके लिए पब्लिक एस्टेट डिवेलपमेंट अथारिटी का गठन करते हुए इसके तहत विभागीय संपत्तियों को एक ही एजेंसी के प्रबंधन में लाना चाहिए।

सार्वजनिक एस्टेट विकास प्राधिकरण के अंतगर्त सरकारी कार्यालयों को स्थान तथा कर्मचारियों की आवासीय व्यवस्था का दारोमदार रहेगा, तो एक बड़ी धनराशि के तहत सार्वजनिक संपत्तियों का निर्माण, रखरखाव तथा भविष्य की योजनाओं का श्रीगणेश होगा, वरना हर विभाग अपने दफ्तरों की चमक और साहबों की कोठियों में लगभग हर वर्ष धन का अपव्यय कर रहा है।

इतना ही नहीं अब समय आ गया है जब सरकार को कुछ शहरों को कलस्टर के रूप में देखते हुए किसी मध्य स्थल पर कर्मचारी नगर बसाने चाहिएं ताकि नए कार्यालयों को उपयुक्त भवन तथा कर्मचारियों को आवास मिल सकें। ये कर्मचारी नगर सरकारी धन से नहीं, अपितु निजी निवेश से आगे बढ़ाए जा सकते हैं।

उदाहरण के लिए भविष्य में सोलन-शिमला के बीच वाकनाघाट या धर्मशाला-पालमपुर के बीच चामुंडा के आसपास निजी निवेश से कर्मचारी नगर बसाए जाएं, तो ये सरकारी धन की बचत तथा नए रोजगार के साधन उत्पन्न करेंगे। ये कर्मचारी नगरों में भविष्य के दफ्तर तथा वर्तमान में कर्मचारियों की आवासीय सुविधाएं उपलब्ध कराने के साथ-साथ शैक्षणिक, चिकित्सा संस्थानों के अलावा आधुनिक बाजारों के जरिए नए व्यापार व रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, दूसरी ओर सार्वजनिक धन की बचत भी होगी। कर्मचारियों को ग्रामीण स्तर तक आवासीय सुविधाएं प्रदान करने के लिए युवा बेरोजगारों को एक योजना के साथ जोड़ा जा सकता है।

सरकार की गारंटी के तहत बेरोजगारों को कर्मचारियों को आवास तथा विभागीय भवनों के निर्माण में प्रेरित करके उन्हें एक नियमित आमदनी दे कर भी प्रदेश बचत कर सकता है। भविष्य की रूपरेखा में हिमाचल का प्रशासनिक ढांचा भी बदलाव चाहता है। बहुत पहले से अगर मत्स्य विभाग का निदेशालय बिलासपुर से, पूर्व सैनिक कल्याण बोर्ड हमीरपुर या स्कूल शिक्षा बोर्ड धर्मशाला से चल सकते हैं, तो इस दिशा में शिमला से कुछ अन्य कार्यालय भी स्थानांतरित किए जा सकते हैं।

मेडिकल यूनिवर्सिटी मंडी के समीप स्वास्थ्य निदेशालय, स्कूल शिक्षा बोर्ड धर्मशाला के समीप शिक्षा निदेशालय तथा खेल एवं युवा सेवाएं, पालमपुर कृषि विश्वविद्यालय के समीप कृषि तथा सोलन बागबानी विश्वविद्यालय के करीब बागबानी विभाग के निदेशालय स्थापित कर दें, तो शिमला का दबाव कम हो जाएगा। इसी तरह जिला स्तर पर भी कई कार्यालय उपमंडल स्तर पर स्थानांतरित किए जा सकते।

शहरी परिसर में कृषि, बागबानी, पशु एवं मत्स्य तथा वन विभाग जैसे कार्यलयों को उपमंडल स्तर पर भेज कर जिला मुख्यालयों में शिमला के बोझ को स्थानांतरित किया जा सकता है। इसी के साथ शहरों का वर्गीकरण करते हुए कहीं शिक्षा का हब, कहीं मेडिकल सिटी का रुतबा, कहीं खेल नगरी का तमगा, कहीं सांस्कृतिक, तो कहीं धरोहर सिटी का प्रारूप विकसित किया जा सकता है।

शिमला को अब राज्य राजधानी क्षेत्र और धर्मशाला को विंटर कैपिटल क्षेत्र के रूप में अहमियत मिलनी चाहिए, इसके अलावा दो-तीन शहरों को मिलाकर कलस्टर प्लानिंग के तहत विभिन्न विकास प्राधिकरणों का गठन करना होगा ताकि सरकार अपने धन का सदुपयोग करते हुए पूरे राज्य की अधोसंरचना में सार्वजनिक क्षेत्र को लाभकारी या किफायत की दृष्टि से इस्तेमाल कर सके।

अब समय आ गया है कि अनावश्यक कार्यालयों को एक-दूसरे में समाहित करते हुए खर्च में कटौतियां की जाएं तथा सरकार के आकार व प्रकार में मितव्यतता लाई जा सकती है।

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