Special Report – Girl Child Day / राष्ट्रीय बालिका दिवस

WhatsAppFacebookTwitterLinkedIn

बेटियों को सशक्त बनाने से ही समृद्ध बनेगा भारत

हर साल 24 जनवरी को राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य बेटियों की शिक्षा को बढ़ावा देना, उनके योगदान को सराहना, उनकी समस्याओं को सुनना और समाधान के प्रयास करना है। यह दिन बेटियों में आत्मविश्वास व ऊर्जा का संचार करता है।

आज का समय गवाह है कि देश की बेटियां हर क्षेत्र में अपनी योग्यता और प्रतिभा का परचम लहरा रही हैं। शिक्षा, खेल, विज्ञान, प्रशासन, वाणिज्य, कला, साहित्य और मनोरंजन जैसे विविध क्षेत्रों में उनकी उपलब्धियां न केवल सराहनीय हैं, बल्कि प्रेरणादायक भी हैं। जो बेटियां कभी शारीरिक रूप से कमजोर और केवल घरेलू कामों के लिए उपयुक्त समझी जाती थीं, उन्होंने आज कुश्ती, मुक्केबाजी, भारोत्तोलन जैसी कठिन प्रतियोगिताओं में देश का नाम रोशन किया है।

उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर समाज की उस संकीर्ण मानसिकता को करारा जवाब दिया है जो उन्हें कमतर मानती थी। समाज के बदलते दौर में बेटियां घर की चारदीवारी और रसोई के पारंपरिक दायरों से बाहर निकलकर अपने सपनों को साकार कर रही हैं। वे आज आसमान की ऊंचाइयों को छू रही हैं, चांद और मंगल के मिशनों में अपना योगदान दे रही हैं, और अपने आत्मविश्वास से नए कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं।

लेकिन यह तस्वीर का केवल एक पहलू है। दूसरा पहलू बेहद कड़वा और शर्मनाक है। आज भी हमारे देश में कन्या भ्रूण हत्या जैसी घिनौनी प्रथाएं जारी हैं। लिंगानुपात में असंतुलन इस बात का सबूत है कि समाज में पुत्र मोह की बीमारी अभी भी गहरी जड़ें जमाए हुए है।

पितृसत्तात्मक सोच आज भी बेटियों के समग्र विकास में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। यह दुर्भाग्यपूर्ण सच है कि समाज का एक बड़ा तबका अब भी रूढ़िवादी सोच से ग्रसित है और यह मानने को तैयार नहीं कि बेटियां बेटों से किसी भी मामले में कम नहीं हैं। दहेज, बाल विवाह, शिक्षा में भेदभाव और संपत्ति में असमान अधिकार जैसी कुरीतियां आज भी बेटियों के विकास में रोड़े अटकाती हैं।

सरकार की ओर से महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा बेटियों की स्थिति में सुधार के लिए कई महत्वाकांक्षी योजनाएं और अभियान चलाए जा रहे हैं। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, सुकन्या समृद्धि योजना जैसी पहलों से निश्चित रूप से सकारात्मक परिणाम मिले हैं, लेकिन केवल सरकारी योजनाओं से बदलाव नहीं आ सकता। असली बदलाव तो तब आएगा जब समाज की मानसिकता बदलेगी। इन सभी प्रयासों के बावजूद बेटियों की सुरक्षा आज भी सबसे बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है।

माता-पिता तब तक चैन की नींद नहीं सो पाते जब तक उनकी बेटियां स्कूल, कॉलेज या दफ्तर से सुरक्षित घर न लौट आएं। यह कैसी विडंबना है कि जिस देश में बेटियों को लक्ष्मी और दुर्गा का रूप माना जाता है, वहीं उन्हें हर कदम पर असुरक्षा का सामना करना पड़ता है।

बढ़ती छेड़छाड़, यौन हिंसा और अपराध की घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि बेटियों को आत्मरक्षा के कौशल सिखाना अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है। जब बेटियां आत्मरक्षा में प्रशिक्षित होंगी, तो न केवल वे अपनी सुरक्षा के प्रति सजग होंगी, बल्कि आत्मविश्वास के साथ जीवन की हर चुनौती का सामना कर सकेंगी।

Share Reality:
WhatsAppFacebookTwitterLinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *