Special report on Rastriya Swayam Sewak Sangh Foundation Day October 20 and on the occasion of Vijayadashami Day. Shri Mohan Bhagwat Ji addressed a huge gathering of swayam sevaks in Nagpur Maharashtra. Prime Minister Shri Narendra Modi conveyed his wishes and appreciated the discipline and learnings of the Sangh on this occasion आरएसएस प्रमुख ने विजयादशमी पर आत्म-जागरूकता, स्वदेशी और सामाजिक समरसता के महत्व पर जोर दिया
नागपुर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को महाराष्ट्र के नागपुर में विजयादशमी पर कार्यकर्ताओं और समर्थकों को संबोधित करते हुए आत्म-जागरूकता, स्वदेशी, सामाजिक समरसता, पारिवारिक मूल्यों और राष्ट्रीय एकता के महत्व पर जोर दिया।

भागवत ने कहा कि संगठन ने पिछले साल अपने सौ साल पूरे होने के मौके पर कई प्रोग्राम किए थे और विजयादशमी की सभा साल भर के कार्यक्रमों के समापन का प्रतीक है। उन्होंने संत शिरोमणि के नाम से मशहूर संत रविदास महाराज की 650वीं जयंती पर भी रोशनी डाली और कहा कि लोगों को संत के जीवन और शिक्षाओं से परिचित कराने के लिए देश भर में प्रोग्राम किए जा रहे हैं। समाज में उनके योगदान के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए आरएसएस की ब्रांचों में भी इवेंट किए जा रहे हैं।
बड़े आध्यात्मिक नेताओं के योगदान को याद करते हुए, भागवत ने कहा कि उनके जीवन ने सांस्कृतिक मूल्यों को बनाए रखने और समाज को मजबूत करने की प्रेरणा दी। अपने जीवन के उदाहरण से, उन्होंने उस समय समाज को आराम और हिम्मत दी, उनकी हिम्मत बढ़ाई और उनके मूल्यों को बनाए रखा।
भागवत ने आर्य समाज के तपस्वी, शिक्षाविद, शुद्धि आंदोलन के नेता और स्वतंत्रता सेनानी स्वामी श्रद्धानंद के बारे में भी बात की और कहा कि उनकी शहादत को 100 साल हो गए हैं। उन्होंने स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती को भी याद किया, जिन्होंने ओडिशा में आदिवासी समुदायों की सेवा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था और जिनकी जन्म शताब्दी मनाई जा रही है।

भागवत के अनुसार, इन हस्तियों को याद करना खास तौर पर इसलिए जरूरी था क्योंकि आरएसएस ने पिछली सदी में लोगों में आत्म-जागरूकता जगाने और भारत की पहचान और सांस्कृतिक मूल्यों को मजबूत करने के लिए काम किया था। उन्हें याद करना इसलिए भी सही है क्योंकि संघ पिछले 100 सालों से जो काम कर रहा है, उसका मकसद ठीक यही आत्म-जागरूकता जगाना है।
इसी आत्म-जागरूकता, पहचान और मूल्यों की बुनियाद पर यह भारत को एकजुट और मजबूत बनाने की कोशिश करता है। जैसा कि हमारे प्रांत संघचालक ने पंच परिवर्तन के बारे में अपनी शुरुआती बातों में बताया था। इसका एक खास पहलू आत्म-जागरूकता अपनाना और स्वदेशी अपनाना है। यह आत्म-जागरूकता हमारे संविधान की प्रस्तावना में दिखती है, जहां हम खुद को ‘हम, भारत के लोग’ कहते हैं। भागवत ने कहा कि भारत की परंपराओं से जुड़े मूल्य लोगों के व्यवहार और रोजमर्रा की जिंदगी में दिखने चाहिए।
भारत की आजादी की लड़ाई के आस-पास के हालात को याद करते हुए, उन्होंने कहा कि उस समय के नेताओं और समाज ने बहुत ज्यादा लगन और दृढ़ता दिखाई थी। हमें मिलते-जुलते गुणों को अपनाना चाहिए और उन्हें अपने व्यवहार और रोजमर्रा की जिंदगी में अपनाना चाहिए। हमारे देश की आजादी की लड़ाई के समय, जैसा कि हमारे चीफ गेस्ट ने बताया, जब संघ की स्थापना हुई थी, तो एक अलग माहौल था। उस माहौल में, हमारी आजादी के लिए लड़ने वाले महान नेताओं ने, उस समय के समाज के साथ मिलकर, बहुत ज्यादा तपस्या और लगन से, वह कर दिखाया जिसकी जरूरत थी। आज, हमारे मौजूदा हालात में, हमें अपने लक्ष्यों को पाने के लिए उस लगन से कई गुना ज्यादा की जरूरत है। जब हम आज के हालात को देखते हैं, तो यह साफ हो जाता है।

अस्तित्व के बारे में भारत की पारंपरिक समझ को समझाते हुए, भागवत ने कहा कि विविधता स्वाभाविक थी और लगातार बदल रही थी, लेकिन सभी अस्तित्व की अंदरूनी एकता हमेशा बनी रही। हमारी परंपरा हमें बताती है कि दुनिया में अलग-अलग तरह की चीजें होती हैं, जो पूरी तरह से प्राकृतिक हैं। यह प्राकृतिक होने के साथ-साथ हमेशा बदलती भी रहती हैं। जैसे यह प्राकृतिक और गतिशील है, वैसे ही सभी चीजों की सबसे बड़ी एकता का सत्य पक्का, अटल और हमेशा रहने वाला है। भगवान ने इंसानों को बुद्धि और विवेक का तोहफा दिया है। अपने विचारों को शुद्ध करके, अगर कोई इंसान अपने अंदर इस सच को समझ ले और इसे दुनिया में दिखाई देता हुआ देखे, और इसके हिसाब से अपनी जिंदगी जिए, तो सिर्फ इसी से उसे हमेशा रहने वाली खुशी मिलती है।
उन्होंने कहा कि खुशी की यह तलाश इंसानियत की हमेशा की तलाश है और इंसानी तरक्की इसी कोशिश से आगे बढ़ती है। इंसान अपने विचारों को शुद्ध करके, इस बुनियादी एकता को पहचानकर और अपनी जिंदगी को इसके साथ जोड़कर हमेशा रहने वाली खुशी पा सकता है। भागवत ने खुशी की तलाश को इंसानी खोज बताया, जो तरक्की को आगे बढ़ाती है।
संघ के सौ साल पूरे होने के अवसर पर चलाए जा रहे आउटरीच प्रोग्राम की शुरुआती जानकारी शेयर करते हुए, भागवत ने कहा कि संगठन ने देश भर के गांवों, शहरी बस्तियों और घरों तक पहुंचने के लिए एक बड़ा कैंपेन चलाया है। आउटरीच की कोशिश में 461,527 गांव और 41,076 शहरी बस्तियां शामिल हुईं, जिन्हें संगठन की भाषा में ‘बस्तियां’ कहा जाता है। उनके बताए आंकड़ों के मुताबिक, यह कैंपेन 101,988,511 घरों और परिवारों तक पहुंचा। जिलों में जाने-माने और समझदार नागरिकों के लिए चर्चाएं और सिम्पोजिया आयोजित किए गए थे। कुल 1,117 ऐसे प्रोग्राम हुए, जिनमें 426,497 पुरुषों और महिलाओं ने हिस्सा लिया। शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, भागवत ने साफ किया कि फाइनल ऑफिशियल रिपोर्ट संगठन की एग्जीक्यूटिव कमिटी की मीटिंग में पेश की जाएगी और आंकड़े बढ़ सकते हैं।

सामाजिक एकता पर चर्चा करते हुए, भागवत ने कहा कि भारत के सभ्यतागत नजरिए ने ऐतिहासिक रूप से अलग-अलग भाषाओं, जातियों, संप्रदायों और समुदायों के लोगों को काबिल बनाया है, ताकि सामुदायिक पहचानें बनी रहें और साथ ही एक व्यापक जुड़ाव की भावना भी कायम रहे। जब भावनात्मक एकता और भारतीय राष्ट्रीयता सर्वोपरि रही, तब समाज अपनी शक्ति और एकजुटता बनाए रखने में सक्षम रहा। हालांकि, इस साझा पहचान को भुला देने से समाज में विभाजन पैदा हुआ और सामूहिक आत्मविश्वास कमजोर हुआ।
भागवत के अनुसार, डर और असुरक्षा की भावना लोगों को संकीर्ण पहचानों की ओर धकेल सकती है, जिससे वे खुद को दूसरों से अलग करने वाली दीवारें खड़ी कर लेते हैं। उन्होंने एकता और जुड़ाव की एक व्यापक भावना को फिर से स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। ‘पंच परिवर्तन’ को कोई अल्पकालिक अभियान नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव की एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पंच परिवर्तन को हर जगह स्वीकार किया जा रहा है, क्योंकि जिन समस्याओं के समाधान के रूप में इसे पेश किया गया है, उन्हें हर कोई महसूस कर रहा है। विशेष रूप से परिवार में जागरूकता, नागरिक अनुशासन और पर्यावरण जैसे विषयों को दुनिया भर के लोग तुरंत समझ जाते हैं। दुनिया के अन्य देशों में भी इनकी आवश्यकता महसूस की गई है। हालांकि, यह कोई एक साल का कार्यक्रम नहीं है, और न ही इसे ऐसा माना गया है। स्वयंसेवकों और नागरिकों को यह समझना चाहिए कि इसे जीवन जीने के एक ऐसे तरीके के रूप में, जिसका उद्देश्य हमारे आचरण में बदलाव लाना है, प्रत्यक्ष कार्यों के माध्यम से एक आदत बना लेना चाहिए।

भागवत ने कहा कि ये बदलाव तभी संभव हैं जब लोग इन्हें अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लें और अपनी स्थायी आदतें विकसित कर लें। उन्होंने आरएसएस स्वयंसेवकों और नागरिकों से आग्रह किया कि वे केवल चर्चाओं या अस्थायी पहलों तक सीमित न रहें, बल्कि इन सिद्धांतों को अपने कार्यों में उतारें।
भारत की बढ़ती वैश्विक पहचान का जिक्र करते हुए भागवत ने कहा कि देश की ओर बढ़ता अंतरराष्ट्रीय ध्यान न केवल भारत की प्रगति को दर्शाता है, बल्कि यह आधुनिक समाजों के सामने मौजूद समस्याओं के समाधान की तलाश को भी दिखाता है। भौतिकवाद, व्यक्तिवाद और अत्यधिक उपभोग पर आधारित जीवनशैली ने भौतिक समृद्धि के बावजूद कई चुनौतियां पैदा कर दी हैं। इनमें विविधता का प्रबंधन करना, विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना, अलग-अलग पृष्ठभूमि वाले लोगों के बीच सद्भाव को बढ़ावा देना, पारिवारिक रिश्तों को सहेजना और नई पीढ़ी में मूल्यों के ह्रास को रोकना जैसी चुनौतियां शामिल हैं।

भागवत ने कहा कि भारत के पास अपने विकास को जारी रखते हुए दुनिया के सामने एक वैकल्पिक दृष्टिकोण पेश करने का अवसर और जिम्मेदारी दोनों हैं। उन्होंने कहा कि भारत की प्रगति ऐसी होनी चाहिए जो वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए एक व्यापक मानक स्थापित करने में भी मदद करे। उन्होंने ‘हिंदू’ शब्द का जिक्र एक ऐसे आध्यात्मिक और सभ्यतागत दृष्टिकोण के संदर्भ में किया, जो उनके अनुसार, सार्वभौमिक भाईचारे और मानवता पर जोर देता है। साथ ही, यह लोगों को अपनी-अपनी भाषाओं, क्षेत्रीय परंपराओं, रीति-रिवाजों और मान्यताओं को बनाए रखने की भी अनुमति देता है।
नशीले पदार्थों की लत के मुद्दे पर बात करते हुए, भागवत ने कहा कि यह समस्या तब भी बनी हुई है, जबकि लोग आम तौर पर नशीले पदार्थों के हानिकारक प्रभावों के बारे में जानते हैं। उन्होंने इस लत को एक गंभीर राष्ट्रीय चिंता बताया और युवाओं में समझदारी और सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने के महत्व पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि बच्चों को सही दिशा दिखाने और उन्हें हानिकारक आदतों के परिणामों को समझने में मदद करने में माता-पिता की अहम भूमिका होती है। उन्होंने आगे कहा कि नई पीढ़ी को नशीले पदार्थों से दूर रहने के लिए अनुशासन विकसित करने की जरूरत है।

भागवत ने विज्ञान और तकनीक की तेज प्रगति के बारे में भी बात की। उन्होंने कहा कि तकनीकी प्रगति तो होनी ही है, लेकिन इसे जिम्मेदारी के साथ अपनाना चाहिए। हालांकि, हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि तकनीक केवल एक साधन है। तकनीकी विकास ऐसा होना चाहिए जो समाज की भलाई करे, न कि उसे नुकसान पहुंचाए।
डिजिटल कंटेंट से जुड़ी चिंताओं का जिक्र करते हुए भागवत ने कहा कि भारत में इसके नियमन की जरूरत पर चर्चा चल रही है खासकर ओवर-द-टॉप प्लेटफॉर्म्स के संदर्भ में। सरकार और प्रशासन को इस मुद्दे पर विचार करना चाहिए और उचित कदम उठाने चाहिए।
भागवत ने प्राकृतिक और मानव-जनित आपदाओं का जिक्र किया और नेपाल तथा कोलकाता में हाल ही में हुई त्रासदियों पर चिंता जताई।
उन्होंने कहा कि मानव-जनित और प्राकृतिक, दोनों तरह की आपदाएं आती हैं। हाल ही में नेपाल में एक दुखद आपदा आई। कोलकाता में भी एक घटना हुई; हालांकि इसके लिए प्रकृति को दोष नहीं दिया जा सकता, क्योंकि यह हमारी अपनी अत्यधिक भीड़भाड़ और लापरवाही का नतीजा है। इस दुख में सभी शामिल हैं और फिलहाल राहत कार्य चल रहे हैं। नेपाल में जो हुआ, वह क्यों हुआ? असंतुलित और एकतरफा विकास के तरीकों ने पूरे हिमालय में पारिस्थितिक अस्थिरता पैदा कर दी है। हमें इस तरह के विकास को आगे बढ़ाने के विज्ञान को फिर से समझने की जरूरत है।
संघ के वार्षिक विजयादशमी कार्यक्रम में मोहन भागवत ने कैप्टन स्मित मच्छार का किया जिक्र, बोले- यही है हिंदू स्वभाव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के विजयादशमी भाषण की तारीफ की। उन्होंने इस संबोधन को ‘अत्यंत प्रेरणादायी’ बताया। पीएम मोदी ने कहा कि उनका भाषण राष्ट्रीय प्रगति, सामाजिक एकता, आत्मनिर्भरता, चरित्र निर्माण और ‘पंच परिवर्तन’ पहलों पर केंद्रित था।

पीएम मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए लिखा, “नागपुर में शताब्दी वर्ष श्री विजयादशमी उत्सव के अवसर पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का संबोधन अत्यंत प्रेरणादायी है। इस अवसर पर उन्होंने राष्ट्र की प्रगति, सामाजिक एकता, आत्मनिर्भरता और समाज के सशक्तीकरण सहित कई विषयों पर विस्तार से अपने विचार रखे हैं।”
पीएम मोदी ने ‘एक्स’ पोस्ट में लिखा, “सेवा और राष्ट्र निर्माण पर उन्होंने पूरा बल दिया है, जो संघ के सभी स्वयंसेवकों के जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है। उन्होंने पंच परिवर्तन का भी उल्लेख किया है, जो समाज में सकारात्मक परिवर्तन के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।”
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर में संगठन के स्थापना दिवस पर वार्षिक विजयादशमी रैली को संबोधित किया था। उन्होंने आत्म-जागरूकता, स्वदेशी, सामाजिक सद्भाव, पारिवारिक मूल्यों और राष्ट्रीय एकता के महत्व पर प्रकाश डाला। भागवत ने कहा कि संगठन ने अपनी शताब्दी समारोह के तहत पिछले एक साल में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए हैं और विजयादशमी समारोह साल भर की गतिविधियों का समापन है।
आरएसएस प्रमुख ने ‘पंच परिवर्तन’ को सकारात्मक सामाजिक नवीनीकरण, राष्ट्रीय प्रगति और व्यक्तिगत व्यवहार परिवर्तन के लिए एक ‘महत्वपूर्ण खाका’ बताया। इसमें पांच बातें (सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण चेतना, स्व-बोध और स्वदेशी, और नागरिक अनुशासन) शामिल हैं।

मोहन भागवत ने कहा, “पंच परिवर्तन हर जगह स्वीकार किए जाते हैं, क्योंकि जिन परिस्थितियों के समाधान के रूप में ये काम करते हैं, उन्हें हर कोई अनुभव कर रहा है। विशेष रूप से, पारिवारिक जागरूकता, नागरिक अनुशासन और पर्यावरण- इन्हें दुनिया भर के लोग तुरंत समझ लेते हैं। इनकी जरूरत दुनिया के अन्य देशों में भी महसूस की गई है।”
उन्होंने कहा, “हालांकि, यह एक साल का कार्यक्रम नहीं है, न ही इसे इस तरह से सोचा गया है। स्वयंसेवकों को ध्यान में रखना चाहिए, और नागरिकों को भी समझना चाहिए कि हमारे आचरण में परिवर्तन लाने के लिए जीवन जीने के तरीके के रूप में, इसे प्रत्यक्ष कार्रवाई के माध्यम से आदत बना लेना चाहिए।”
संघ के वार्षिक विजयादशमी कार्यक्रम में मोहन भागवत ने कैप्टन स्मित मच्छार का किया जिक्र, बोले- यही है हिंदू स्वभाव
नागपुर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने कैप्टन स्मित मच्छार की तारीफ की। उन्होंने कहा कि उनका यह कदम भारतीय समाज में रचे-बसे मूल्यों और परंपराओं का प्रतीक है।
नागपुर में संघ के वार्षिक विजयादशमी कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि कठिन परिस्थिति में कैप्टन स्मित की प्रतिक्रिया किसी विशेष ट्रेनिंग का नतीजा नहीं, बल्कि उनके अंदर मौजूद स्वाभाविक मूल्यों की अभिव्यक्ति थी।
उन्होंने कहा, “इसी भाव से प्रेरित होकर कैप्टन स्मित मच्छार ने हाल ही में जो किया, वह स्वाभाविक था। ऐसी स्थिति में क्या करना है, इसकी कोई ट्रेनिंग नहीं थी, उनके अंदर की परंपरा और संस्कार ही परीक्षा की उस घड़ी में सामने आ गए।”
मोहन भागवत ने इसे ही हिंदू स्वभाव बताया। उन्होंने कहा कि यही हिंदू स्वभाव है, जो विविधता की गरिमा और सुरक्षा का पोषण और संरक्षण करता है। यह कार्य राष्ट्रीय एकता और वैश्विक सद्भाव के लिए एक रचनात्मक शक्ति के रूप में काम करता है।

संघ प्रमुख ने कहा कि आरएसएस इन मूल्यों को केवल भाषणों में चर्चा करके नहीं, बल्कि व्यावहारिक कार्यों के जरिए स्थापित करना चाहता है। लोग संघ में भाषण सुनने नहीं आते, वे पहले आते हैं और अपने कार्यों के जरिए इस भाव का अभ्यास करते हैं।
बता दें कि कैप्टन स्मित मच्छार दुबई से तेल अवीव जा रहे बोइंग 737 विमान का संचालन कर रहे थे, तभी फ्लाइट के दौरान उनके सह-पायलट ने उन पर चाकू से हमला कर दिया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद मच्छार ने कॉकपिट का दरवाजा खोलने में कामयाबी हासिल की, जिससे यात्रियों और क्रू को हमलावर पर काबू पाने और स्थिति को और बिगड़ने से रोकने में मदद मिली।
इस घटना के कारण विमान तेजी से नीचे की ओर आने लगा, जिसके बाद यात्रियों और क्रू मेंबर्स ने बीच-बचाव किया और स्थिति को नियंत्रण में लाने में मदद की। विमान को बाद में सऊदी अरब के तबुक में आपातकालीन लैंडिंग करानी पड़ी। विमान में सवार सभी 174 यात्री सुरक्षित बताए गए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पायलट की तारीफ करते हुए उन्हें ‘हीरो’ बताया था और उनकी बहादुरी और दृढ़ संकल्प की सराहना की थी। पीएम मोदी ने कहा था कि मच्छर के इस कदम ने कई लोगों की जान बचाई और एक बड़ी त्रासदी को टाल दिया।
कैप्टन मच्छार विमानन क्षेत्र में 13 साल से अधिक के अनुभव वाले पायलट हैं। फ्लाईदुबई में शामिल होने से पहले उन्होंने स्पाइसजेट में काम किया था, जहां वे लाइन ट्रेनिंग कैप्टन के रूप में कार्यरत थे। उन्होंने मुख्य रूप से बोइंग 737 विमान पर लगभग 9,750 घंटे की उड़ान भरी है।
‘स्वयंसेवकों ने राष्ट्र-प्रथम की भावना से किया है कार्य’, आरएसएस स्थापना दिवस पर पीएम मोदी ने दी शुभकामनाएं
नई दिल्ली, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के स्थापना दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुभकामनाएं दी। उन्होंने कहा कि स्वयंसेवकों ने राष्ट्र-प्रथम की भावना से समाज के उत्थान के लिए किया कार्य है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पोस्ट में लिखा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना दिवस के विशेष अवसर पर सभी स्वयंसेवकों को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं। मैं उन सभी विभूतियों को भी नमन करता हूं, जिन्होंने अपने अथक परिश्रम और सेवाभाव से संघ को सींचा और संवारा है।
पीएम मोदी ने एक्स पोस्ट के जरिए कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सेवा, राष्ट्र निर्माण और सामाजिक प्रतिबद्धता का गौरवशाली शताब्दी वर्ष पूर्ण किया है। अनगिनत स्वयंसेवकों ने अपने समर्पण, कर्तव्य-निष्ठा और राष्ट्र-प्रथम की भावना से सदैव समाज के उत्थान के लिए कार्य किया है। उन्होंने विश्वास जताया कि यह भावना आने वाले समय में भी देश को और सशक्त व सुदृढ़ करेगी।
वहीं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी एक्स पोस्ट के जरिए को बधाई एवं शुभकामनाएं दी।
‘एक्स’ पोस्ट में सीएम फडणवीस ने लिखा, “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना दिवस पर राष्ट्र सेवा, मानवीय मूल्यों और विकसित भारत के दृढ़ संकल्प के साथ काम करने वाले सभी स्वयंसेवकों और सेविकाओं को हार्दिक शुभकामनाएं।”
उन्होंने अपने संदेश में कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्थापना दिन के इस अवसर पर उन सभी स्वयंसेवकों को मनपूर्वक शुभकामनाएं जो राष्ट्रसेवा, मानवीय मूल्यों और विकसित भारत के संकल्प को लेकर काम कर रहे हैं।
एक अन्य ‘एक्स’ पोस्ट में सीएम फडणवीस ने लिखा, “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्थापना दिवस पर राष्ट्र की सेवा के लिए खुद को पूरी तरह समर्पित करने वाले सभी समर्पित स्वयंसेवकों और सेविकाओं को हार्दिक शुभकामनाएं।”
बता दें कि इस साल आरएसएस अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है और इस मौके पर नागपुर में मंगलवार को विजयादशमी उत्सव का भी आयोजन किया गया है।
रिजीम चेंज से हालात नहीं बदलते, भारत को एकजुट होकर आगे बढ़ना है : मोहन भागवत
नागपुर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष श्री विजयादशमी उत्सव का आयोजन नागपुर में हुआ। इस मौके पर संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने देश, समाज और दुनिया के मौजूदा हालात पर विस्तार से बात की। कार्यक्रम की शुरुआत स्वयंसेवकों के पथ संचलन से हुई, जिसमें भागवत भी मौजूद रहे।
संबोधन में मोहन भागवत ने फ्रांस, अल्बानिया, नेपाल और बांग्लादेश में चल रहे विरोध-प्रदर्शनों का जिक्र किया और रिजीम चेंज की राजनीति पर बयान दिया।
मोहन भागवत ने कहा, “एक पश्चिम से आंधी चली है जो हर प्रकार की भद्रता, व्यवस्था, संस्कार का विरोध करती है और उसे नष्ट करना चाहती है। देखिए फ्रांस में क्या हो रहा है, अल्बानिया में क्या हो रहा है, नेपाल, बांग्लादेश में क्या हुआ। वे कहते हैं रिजीम चेंज करने से परिस्थिति बदलेगी। लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं है। पहले नहीं हुआ, आज भी नहीं होगा।”
उन्होंने कहा कि भारत, हिंदू और संघ को तोड़ने के लिए आसुरी ताकतें योजना बनाकर काम कर रही हैं। उसी प्रकृति के कुछ लोग इसमें सहायता के लिए मिल जाते हैं। क्षुद्र सत्ता-स्वार्थ और विवेकहीनता के कारण कुछ महत्वाकांक्षी नेता भी इसमें शामिल हो जाते हैं। भारत सहित सारे विश्व में जो भद्रता, मांगल्य, सांस्कृतिक और मानवीय संस्कार हैं, उन्हें नष्ट करने की आसुरी प्रतिज्ञा लेकर पश्चिम से एक आंधी चली है, जिससे तथाकथित प्रगतिशील देश भी त्रस्त और असहाय हैं।
भारत की विविधता पर बोलते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि भारत माता का सर्वोच्च स्थान है। देश में अलग-अलग पंथ, प्रांत, जातियां, भाषाएं, खानपान और रीति-रिवाज हैं, लेकिन भारत को एकजुट होकर आगे बढ़ना है। उन्होंने कहा कि हम जब भी बंटे, कमजोर हुए। भारत पहले भी एक होकर आगे बढ़ा है और भविष्य में भी इसी एकता के साथ आगे बढ़ता रहेगा।
उन्होंने हिंदू भाव और हिंदू स्वभाव की व्याख्या करते हुए कहा कि हमारे राष्ट्र की चेतना यही सनातन दृष्टि है, जिसे आज हम भारत के लोगों सहित सारा विश्व हिंदू दृष्टि के नाम से जानता है। इसमें कोई विशिष्ट पूजा पद्धति, खान-पान, रहन-सहन या जाति-भाषा की अनिवार्यता नहीं है। सबसे ऊपर आध्यात्मिकता, मानवता और विश्वबंधुत्व ही सनातन दृष्टि का लक्षण है।
सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा, “संगठित व बलसंपन्न हिंदू समाज की बात करना या उसके लिए कार्य करना सर्वपंथ-समादर की भावना अथवा राष्ट्र की भावनिक एकात्मता के विरुद्ध नहीं है। हिंदू समाज का विचार व स्वभाव समावेशक होने के नाते संघ कार्य हम सबकी भावनिक एकात्मता, सद्भावना व सदाचार का पोषक ही होगा। इसी संस्कार से प्रेरित होकर, कैप्टन स्मित मच्छार ने हाल ही में जो किया, वह स्वाभाविक था। ऐसी स्थिति में क्या करना है, इसके लिए कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं दिया गया था। बल्कि उस परीक्षा की घड़ी में उनके भीतर के संस्कार और मूल्य स्वतः ही सामने आ गए। यही हिंदू स्वभाव है। यह कार्य राष्ट्रीय एकता और वैश्विक सद्भाव के लिए एक रचनात्मक शक्ति का काम करता है और यह केवल बातों तक सीमित नहीं है। लोग संघ से इसलिए नहीं जुड़ते कि वे भाषण सुनें; बल्कि वे यहां आते हैं और अपने कार्यों के माध्यम से इन संस्कारों को अपने जीवन में उतारते हैं।”
मोहन भागवत ने कहा कि हम सबका परस्पर नाता और भारत के साथ संबंध जीवंत है और हृदय का होने के कारण बिना शर्त है- ‘तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें न रहें’। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसी हिंदू भाव को जगाकर संपूर्ण समाज को एक सुसंगठित और बलसंपन्न समाज बनाने के लिए काम कर रहा है।
इस साल को दो महान हस्तियों के स्मरण का वर्ष बताते हुए भागवत ने कहा कि यह आर्य समाज के तपस्वी, धर्म के रक्षक, शिक्षाविद, स्वतंत्रता सेनानी और शुद्धि आंदोलन के प्रणेता स्वामी श्रद्धानंद जी के बलिदान के 100 वर्ष पूरे होने का वर्ष है। साथ ही यह ओडिशा के वनवासी समुदायों के बीच सेवा करने वाले और वहीं अपना जीवन देने वाले स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी महाराज की जन्म शताब्दी का वर्ष भी है।
इसके अलावा उन्होंने ‘हिंदू मेला’ के प्रेरक बंग भूमि के स्वर्गीय राज नारायण बसु के जन्म के 200वें वर्ष का भी उल्लेख किया, जिन्होंने स्वदेशी मेलों के जरिए समाज में स्व के बोध को जगाने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि पिछले 100 वर्षों से संघ भी इसी स्व-बोध की नींव पर भारत को उसकी अपनी पहचान, संस्कृति और परंपराओं के आधार पर संगठित और मजबूत बनाने का काम कर रहा है।
आंदोलनों पर उन्होंने कहा कि व्यवस्था की कमियों के चलते आंदोलन स्वाभाविक हैं, लेकिन आंदोलन समाधान देने के लिए होने चाहिए। वे राजनीति का साधन नहीं बनने चाहिए। भावनाएं तीव्र होने पर भी कानून और भद्र व्यवहार की मर्यादा में रहना चाहिए। उन्होंने ग्रामीण शिक्षा में स्वयंसेवकों के प्रयासों का भी जिक्र किया और बताया कि 21 प्रांतों के 210 जिलों के 1296 विद्यालयों में जहां ग्रामीणों की सहभागिता और स्वयंसेवकों का साथ रहा, वहां छात्रों की उपस्थिति और सीखने के स्तर में सुधार देखा गया।