PMO -‘विकसित भारत के साथ बदलना होगा हमारी पुलिस प्रणाली को भी’: मोदी

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PM Modi Chaired 60th DGP – IG Conference. Prime minister Modi stated about the importance of mandatory need of change in the current working module of Police system nationwide. विकसित भारत के सुरक्षा विजन में नई पुलिसिंग की राह, डीजीपी-आईजी सम्मेलन में प्रधानमंत्री का मार्गदर्शन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 60वें डीजीपी-आईजी सम्मेलन में देश की पुलिस व्यवस्था को व्यापक, संवेदनशील और आधुनिक रूप देने का स्पष्ट संदेश दिया। इस सम्मेलन ने न केवल सुरक्षा तंत्र के भविष्य का खाका पेश किया, बल्कि पुलिस नेतृत्व को बदलते भारत की आकांक्षाओं के अनुरूप अपनी भूमिका पुनर्परिभाषित करने का आह्वान भी किया। विकसित भारत 2047 की दिशा में यह सम्मेलन एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ, जिसमें प्रधानमंत्री ने पुलिसिंग के कई मूलभूत प्रश्नों और अमल योग्य सुधारों पर गंभीरता से चर्चा की।

प्रधानमंत्री ने कहा कि आज का भारत तेज़ी से बदल रहा है और इसी के साथ बदलना होगा हमारी पुलिस प्रणाली को भी। औपनिवेशिक काल में बने कानून और ढांचे अब वर्तमान समाज की जरूरतों को पूरा नहीं करते। इसलिए इन कानूनों को सरल, न्यायसंगत और आधुनिक समय के अनुरूप बनाना आज की प्राथमिक आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों और बाद में सरकारों द्वारा बनाए गए कानूनी ढांचे में कई जगह अनावश्यक कठोरता, पेचीदगी और पुरातन सोच दिखाई देती है, जिन्हें बदलने का समय आ गया है। नए कानूनों और नवाचारों के बारे में पुलिस बल को जागरूक रहकर अपनी क्षमताओं का विस्तार करना होगा।

सम्मेलन में 700 से अधिक अधिकारी वर्चुअली जुड़े, जो इस बात का प्रमाण है कि देश का पुलिस नेतृत्व सुरक्षा व्यवस्था के आधुनिकीकरण और एकीकृत दृष्टिकोण की दिशा में एकसाथ आगे बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से इस बात पर बल दिया कि पुलिस बल सक्रिय योजना, वास्तविक समय में समन्वय और त्वरित प्रतिक्रिया की संस्कृति को अपनाए। प्राकृतिक आपदा हो या कोई आपात स्थिति, पुलिस की समयबद्ध कार्रवाई जीवन की सुरक्षा का पहला आधार होती है। इसलिए एक मज़बूत, प्रशिक्षित और तकनीक-सक्षम आपदा प्रतिक्रिया तंत्र तैयार करना समय की मांग है।

प्रधानमंत्री मोदी ने युवा पीढ़ी की पुलिस के प्रति धारणा बदलने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि पुलिस का स्वरूप भय का नहीं, बल्कि विश्वास का होना चाहिए। युवाओं को कानून व्यवस्था का सहयोगी बनाया जाए, ताकि समाज में सुरक्षा की संस्कृति विकसित हो सके। पुलिस की भावनात्मक क्षमता, संवाद कौशल और संवेदनशीलता इस दिशा में प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने पुलिस बल को डेटाबेस और तकनीकी संसाधनों का प्रभावी उपयोग करने की भी सलाह दी। अपराध और आतंक की नई चुनौतियाँ डेटा, डिजिटल प्लेटफॉर्म और साइबर नेटवर्क पर आधारित हैं। इसलिए एकीकृत डेटाबेस, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, निगरानी प्रणाली और फोरेंसिक विज्ञान पुलिसिंग का अनिवार्य हिस्सा बनेंगे। प्रधानमंत्री ने फोरेंसिक क्षमताओं को बढ़ाने को राष्ट्रीय प्राथमिकता बताते हुए कहा कि वैज्ञानिक दृष्टि से की गई जांच न्याय प्रणाली को विश्वसनीय बनाती है।

आतंकवाद और कट्टरपंथी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए प्रधानमंत्री ने सुरक्षा एजेंसियों को निरंतर सतर्क रहने की सलाह दी। प्रतिबंधित संगठनों की निगरानी, सीमा-पार नेटवर्क पर नियंत्रण, नशीली दवाओं की तस्करी और संगठित अपराध के विरुद्ध निर्णायक रणनीति विकसित करना आवश्यक है, ताकि देश की युवा शक्ति को सुरक्षित रखा जा सके। नशे के दुरुपयोग के खिलाफ समुदाय-आधारित अभियान और पुनर्वास कार्यक्रमों पर जोर देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि यह केवल कानून नहीं, बल्कि सामाजिक कर्तव्य है।

विदेशों में शरण लेने वाले भगोड़ों को वापस लाने की रणनीति भी चर्चा का महत्वपूर्ण विषय रही। वैश्विक मंचों पर भारत की कूटनीतिक शक्ति और कानूनी सहयोग बढ़ रहा है, जिससे आर्थिक अपराधियों और आतंक फैलाने वालों को कानून के दायरे में लाने की प्रक्रिया तेज हो रही है। प्रधानमंत्री ने कहा कि यह आवश्यक है कि पुलिस और जांच एजेंसियाँ अंतरराष्ट्रीय सहयोग और कानूनी प्रक्रियाओं में दक्ष हों। शहरी पुलिस व्यवस्था को मजबूत बनाने पर विशेष जोर देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि महानगरों की जटिलता, जनसंख्या, तकनीकी अपराध और यातायात व्यवस्था नए समाधान की मांग करते हैं। स्मार्ट सिटी, स्मार्ट पुलिसिंग की अवधारणा के बिना असंभव है। इसके लिए प्रशिक्षित मानवबल, आधुनिक संचार तंत्र और डेटा आधारित निगरानी प्रणाली बड़ी भूमिका निभाएंगे।

सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने वामपंथी उग्रवाद पर लगभग निर्णायक सफलता की ओर बढ़ रहे सुरक्षा बलों को सराहा, साथ ही ‌चेताया कि अंतिम जीत तभी मानी जाएगी जब प्रभावित क्षेत्र पूर्णत: सुरक्षित और विकासोन्मुख वातावरण में परिवर्तित हो जाएँ। उन्होंने यह भी कहा कि सुरक्षा एजेंसियों को समाज के साथ विश्वास आधारित साझेदारी बनानी होगी, क्योंकि विकास और सुरक्षा एक-दूसरे के पूरक हैं।

राष्ट्र की सुरक्षा के लिए प्रधानमंत्री ने वर्ष 2047 तक के विजन का उल्लेख किया और कहा कि पुलिस को आने वाली पीढ़ी की चुनौतियों को ध्यान में रखकर अपनी कार्यपद्धति विकसित करनी होगी। आधुनिक भारत की सुरक्षा संरचना ऐसी हो जो तेजी, सटीकता और सहानुभूति-तीनों का संगम हो।

सम्मेलन के अंत में तीन शहरों को पहली बार सम्मान और विशिष्ट सेवा के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक प्रदान किया गया। यह सम्मान उन पुलिस बलों और अधिकारियों को मिलता है जिन्होंने जनता की सेवा, कठिन परिस्थितियों में कार्य, और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में असाधारण योगदान दिया है। यह सम्मान आने वाले वर्षों में पुलिस बल के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा।

देश की आंतरिक सुरक्षा, सामाजिक समरसता और संवेदनशील शासन व्यवस्था में पुलिस की भूमिका सर्वोपरि है। प्रधानमंत्री द्वारा प्रस्तुत दृष्टि यह स्पष्ट करती है कि भविष्य की भारतीय पुलिसिंग केवल कानून लागू करने तक सीमित नहीं होगी, बल्कि वह समाज निर्माण, तकनीकी नेतृत्व और मानवता के संरक्षण की भी जिम्मेदारी निभाएगी। यह सम्मेलन आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित, सक्षम और विश्वासपूर्ण भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में याद किया जाएगा।

नए भारत को सुरक्षा एवं संवेदना वाली नई पुलिस चाहिए

भारतीय लोकतंत्र में पुलिस व्यवस्था कानून-व्यवस्था की आधारभूत धुरी है, परंतु आम नागरिक के मानस में पुलिस की छवि अभी भी कठोरता, डर और दमन से जुड़ी हुई है। इसे केवल अधिकार जताने वाली शक्ति समझा गया है, संवेदनशीलता, जवाबदेही और मित्र भाव से नहीं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय प्रबंधन संस्थान रायपुर में पुलिस महानिदेशकों और महानिरीक्षकों के 60वें अखिल भारतीय सम्मेलन में इसी जटिलता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पुलिस की छवि तभी बदलेगी जब व्यवस्था अधिक प्रोफेशनल, अधिक उत्तरदायी और अधिक मानवीय बने। विकसित भारत की दृष्टि में पुलिस का पुनर्गठन केवल प्रशासनिक सुधार नहीं बल्कि समाज में भरोसे को पुनर्जीवित करने का कार्य भी है।

पुलिस के पास अपराध नियंत्रण, आतंकवाद-निरोध, भीड़ प्रबंधन, आपदा राहत, नशीली दवाओं के खिलाफ अभियान, चुनाव ड्यूटी और वीआईपी सुरक्षा जैसी असंख्य जिम्मेदारियां हैं, लेकिन संसाधन सीमित हैं, कार्य-भार भारी और राजनीतिक दबाव व्यापक हैं। कुछ अधिकारियों के भ्रष्ट या कठोर व्यवहार ने संपूर्ण पुलिस व्यवस्था की छवि पर चोट पहुंचाई है, इसलिए जनता पुलिस के निकट आने पर भी भय का अनुभव करती है। प्रधानमंत्री ने इस स्थिति बदलने की स्पष्ट आवश्यकता जताई और युवाओं में पुलिस की सकारात्मक छवि निर्माण पर बल दिया ताकि आने वाली पीढ़ी पुलिस को मित्र और संरक्षणकर्ता के रूप में पहचाने।

भारतीय लोकतंत्र के संरचनात्मक स्तंभों में पुलिस की भूमिका अत्यंत निर्णायक है। वह केवल अपराधियों से मुकाबला करने वाली शक्ति नहीं बल्कि कानून-व्यवस्था, नैतिकता और जनविश्वास की संरक्षक है। परंतु विडम्बना यह है कि आम जनता के मानस में पुलिस की छवि आज भी कठोरता, डर, भ्रष्टाचार और दमन से जुड़ी हुई दिखाई देती है। समाज पुलिस को “डंडे” और “खाकी” के प्रतीक रूप में पहचानता है, संवेदनशीलता और जवाबदेही के दृष्टिकोण से नहीं। यही कारण है कि पुलिस सुधार दशकों से विमर्श का विषय तो रहा, लेकिन कभी जनांदोलन नहीं बन सका, न चुनावी मुद्दा बना और न ही गंभीर राजनीतिक प्राथमिकता। इसलिये मोदी ने शहरी पुलिसिंग को मजबूत करने, पर्यटक पुलिस को फिर से सक्रिय करने, विश्वविद्यालयों को फोरेंसिक अध्ययन के लिए प्रेरित करने और नए भारतीय न्याय संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम तथा नागरिक सुरक्षा संहिता पर व्यापक जनजागरूकता चलाने की जरूरत रेखांकित की। उनका यह दृष्टिकोण पुलिस को प्रतिक्रियाशील संस्था से आगे बढ़ाकर बुद्धिमान, वैज्ञानिक, पूर्वानुमान आधारित और विश्वसनीय संस्था बनाने की दिशा है।

प्रधानमंत्री की दृष्टि का महत्वपूर्ण आयाम यह है कि पुलिस केवल कानून लागू करने वाली मशीन नहीं बल्कि समाज का सहभागी तंत्र है। यदि पुलिस व्यवहार में संवेदनशीलता, संवाद, पारदर्शिता और विनम्रता विकसित करे तो जनविश्वास स्वतः बढ़ेगा। नए कानूनों के बारे में जन-जागरूकता अभियान इसी सोच का हिस्सा है, क्योंकि कानून तभी प्रभावी होते हैं जब जनता उन्हें समझती और स्वीकार करती है। अपराध की प्रकृति तेजी से बदल रही है, इसलिए पुलिस का प्रशिक्षण, तकनीकी दक्षता, इंटेलिजेंस नेटवर्क और फोरेंसिक क्षमता मजबूत होना अनिवार्य है। प्रधानमंत्री ने नेटग्रिड, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एकीकृत डेटाबेस के प्रभावी उपयोग पर जोर देकर पुलिसिंग को डेटा आधारित, कृत्रिम बुद्धिमता-एआई और वैज्ञानिक सोच से जोड़ने की दिशा दिखाई है। उन्होंने प्रतिबंधित संगठनों की सतत निगरानी, नशीली दवाओं के विरुद्ध बहुस्तरीय रणनीति, कट्टरपंथ से प्रभावित क्षेत्रों में विकास आधारित समाधान, तटीय सुरक्षा के नवाचार, तथा प्राकृतिक आपदाओं में सक्रिय पुलिस नेतृत्व की आवश्यकता भी व्यक्त की। यह सब उस व्यापक सोच का हिस्सा है जिसमें पुलिस केवल अपराध से लड़ने वाली व्यवस्था नहीं बल्कि विकास की रणनीतिक सहभागी शक्ति है।

परंतु पुलिस सुधार केवल निर्देशों से संभव नहीं; इसके लिए संतुलित एवं अत्याधुनिक ढांचे की जरूरत है जिसमें प्रशिक्षण, संसाधन, मनोबल, आचार-नीति, राजनीतिक निर्भरताओं से मुक्ति और सामाजिक सम्मान शामिल हों। आलोचना जितनी महत्वपूर्ण है, पुलिस के संघर्षों को समझना भी उतना ही आवश्यक है, क्योंकि इसी दोतरफा समझ से सुधार का रास्ता निकलता है। प्रधानमंत्री की अपेक्षा है कि पुलिस नेतृत्व खुद को नए भारत की आकांक्षाओं के अनुरूप तैयार करे, लक्ष्य स्पष्ट करे और वह व्यवस्था बनाए जिसमें नागरिक पुलिस को भय से नहीं बल्कि विश्वास से देखें। विकसित भारत की यात्रा में सुरक्षा, न्यायबोध और अनुशासन की संरचना को सशक्त बनाने के लिए पुलिस का आधुनिक, मानवीय और विश्वसनीय स्वरूप अनिवार्य है। यह सुधार केवल तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि सोच, दृष्टि और चरित्र का परिवर्तन है। तभी खाकी का सम्मान लौटेगा, जनता का विश्वास मजबूत होगा और पुलिस व्यवस्था वास्तव में लोकतंत्र की प्रहरी के रूप में पहचानी जाएगी।

प्रधानमंत्री के ताजा विचारों ने स्पष्ट किया है कि पुलिस की छवि सुधारने का अर्थ केवल कठोरता घटाना नहीं, बल्कि उसे प्रोफेशनल, संवेदनशील और जवाबदेह बनाना है। आज जरूरत इस बात की है कि पुलिस व्यवस्था के लिए भय का नहीं, विश्वास और सुरक्षा का केंद्र बने। शहरी पुलिसिंग को सुदृढ़ करने, पर्यटक पुलिस को पुनर्जीवित करने और नए आपराधिक कानूनों पर जन-जागरूकता बढ़ाने की दिशा में पहल इसलिए महत्वपूर्ण है कि इससे पुलिस “डंडे की ताकत” से आगे बढ़कर “मदद की शक्ति” बनेगी। यदि नागरिक को यह अनुभव होने लगे कि पुलिस मदद के लिए तत्पर है, उसके अधिकारों का सम्मान करती है और कानून का निष्पक्ष पालन करती है, तो खाकी वर्दी का अर्थ केवल अनुशासन नहीं बल्कि विश्वास, अभय और सहारा प्रतीत होगा। यही वह परिवर्तन है जो विकसित भारत की सोच में निहित है।

अंग्रेज़ी शासकों ने अपने शासन को थोपने, जनता को नियंत्रित करने और भय-आधारित प्रशासन चलाने हेतु पुलिस तंत्र की रचना की। 1860 के कानून के आधार पर स्थापित भारतीय पुलिस का मूल चरित्र दंडात्मक, शासक-केन्द्रित और कठोर शक्ति-प्रयोग वाला था। स्वतंत्रता के बाद भी इस व्यवस्था में सार्थक बदलाव न होना एक विडंबना है। आज़ाद भारत ने लोकतंत्र अपनाया पर पुलिस ढांचे ने अभी तक औपनिवेशिक सोच को पूरी तरह त्यागा नहीं। परिणामतः पुलिस जनसेवा की बजाय सत्ता को बचाने और भय पैदा करने का उपकरण बनी रह गई। आज आवश्यकता है कि भारत का पुलिस तंत्र भारत के मूल्यों के अनुरूप पुनर्निर्मित हो। विकसित भारत को विकसित सोच वाली पुलिस चाहिए जो नागरिकों के साथ विश्वास-आधारित संबंध बनाए, दमन नहीं बल्कि संरक्षण दे, और कानून को लागू करने में नैतिकता, पारदर्शिता और मानवता को प्राथमिकता दे। ऐसी पुलिस व्यवस्था ही सच्चे अर्थों में लोकतंत्र की प्रहरी बन सकती है और भारत की सभ्यता-संस्कारों का प्रतिबिंब भी।

इसी संदर्भ में पुलिस थानों के नामकरण की सोच पर पुनर्विचार भी आवश्यक है। “थाना” शब्द में दमन और भय की छाया रही है, जबकि लोकतांत्रिक समाज में वह नागरिक सहारा का स्थान होना चाहिए। यदि उन्हें “सुरक्षा केंद्र”, “नागरिक सहायता केंद्र”, “पुलिस सेवा भवन”, “अभय केंद्र” या “सहयोग प्रहरी केंद्र” जैसे नाम दिए जाएं तो नागरिक के मानस में पुलिस की भूमिका का अर्थ बदलने लगेगा। नाम केवल शब्द नहीं होता, वह भाव, चरित्र और अनुभव निर्मित करता है। इस सकारात्मक नामकरण से पुलिस केन्द्र केवल शिकायत या धमकाने का प्रतीक नहीं बल्कि सहायता, समस्या-समाधान, विश्वास और न्याय का केन्द्र बन सकता है। यह प्रतीकात्मक परिवर्तन, यदि व्यवहार सुधार के साथ जुड़ जाए, तो पुलिस के प्रति जनता में सम्मान, निर्भयता और साझेदारी की भावना और अधिक मजबूत होगी और यही वह दिशा है जिसे विकसित भारत की सुरक्षा, नीतिगत सोच और संवेदनशील शासन का स्वरूप कह सकते हैं।

इसके विपरीत आज की वास्तविकता यह है कि जब पुलिस दरवाजे पर आती है, तो नागरिक घबराता है-“कहीं फंस न जाऊं। ” यह भय उस विश्वासहीनता का परिणाम है जिसे बदलना आवश्यक है। अपराध की प्रकृति बदल रही है, साइबर अपराध, आर्थिक अपराध, आतंकवाद, मानव तस्करी, ड्रग नेटवर्क-इनसे मुकाबले के लिए बेहतर प्रशिक्षण, तकनीक और इंटेलिजेंस चाहिए। लोकतंत्र में पुलिस सबसे प्रत्यक्ष शासन-कर्म है। जनता रोज उसे देखती, झेलती और समझती है। खराब अनुभव सीधे शासन के प्रति अविश्वास पैदा करते हैं। विकसित भारत 2047 की आकांक्षाओं में पुलिस वह संरचना है जो सुरक्षा, अनुशासन, न्याय और सामाजिक साझेदारी को सुनिश्चित करती है। पुलिस की वर्दी के भीतर मनुष्य, संवेदना और विवेक दिखाई दे, तभी खाकी का सम्मान लौटेगा और जनता का विश्वास सुदृढ़ होगा। नए भारत के निर्माण में पुलिस का यह रूपांतरण एक निर्णायक धुरी होगा, जहां सुरक्षा और संवेदनशीलता साथ-साथ चलें, और जहां कानून केवल भय नहीं बल्कि न्याय और विश्वास का प्रतीक बने।

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