Special Report – सुखद नहीं रहा नया साल जापान के लिए

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जापान जलजलों के बावजूद

नया साल जापान Japan के लिए सुखद नहीं रहा, बल्कि त्रासद् ही रहा है। पहली जनवरी को ही ऐसा जलजला आया, जिसने जापान को हिला कर रख दिया। सबसे तीव्र 7.6 का भूकंप earthquake था। उसके बाद 155 और झटके लगातार महसूस किए जाते रहे, लेकिन उनकी तीव्रता 4-5 के बीच रही। भूकंपों के कारण करीब 55 जापानियों की मौत हुई। जो अनौपचारिक तौर पर खुलासा किया गया है, उसके मुताबिक हजारों घर क्षतिग्रस्त हुए हैं। हजारों मकान ढह भी गए हैं।

सैकड़ों लोगों के फंसे होने की आशंका है, लिहाजा मृतकों और घायलों का आंकड़ा बढ़ भी सकता है। बीते साल तुर्किए में 7.8 रिक्टर स्केल वाला भूकंप आया था, जिसमें 52, 000 से अधिक लोग मारे गए थे और असंख्य इमारतें ‘मलबा’ हो गई थीं। जापान में 1923 के उस जलजले को भी याद किया जा रहा है, जिसकी तीव्रता लगभग मौजूदा भूकंप जितनी ही थी, लेकिन करीब 1, 40, 000 लोग मारे गए थे। अब मौतों की जो संख्या है या जो क्षतियां हुई हैं, वे अतीत के अनुभव और तुर्किए के जलजले की तुलना में बेहद कम हैं। इसका श्रेय जापान के आपदा प्रबंधन और भूकंपरोधी इमारतों के कानूनों को दिया जा रहा है।

जापान तो जलजलों के ऊपर बसा एक देश है, जो औसतन 5 भूकंपीय झटके हररोज झेलता है। जापान में 6 तीव्रता से ज्यादा के कमोबेश 20 फीसदी भूकंप होते हैं। जलजलों के बावजूद जापान विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। जापान में 2 जनवरी को टोक्यो एयरपोर्ट पर दो विमानों में टक्कर हो गई और विमान आग के शोले में तबदील हो गए।

एक विमान तटरक्षक विभाग का था, जो भूकंप प्रभावितों के लिए राहत सामग्री लेकर जाने वाला था। उसमें सवार 6 में से 5 लोगों की मौत हो गई, जबकि पायलट को बचा लिया गया, लेकिन दूसरे विमान में, जो लैंडिंग कर रहा था, 379 यात्री सवार थे। कितना बड़ा मानवीय संकट सामने था! ऐसी भयानक घटना के बावजूद सभी यात्रियों को सुरक्षित बचा लिया गया।

यह है जापान के आपदा प्रबंधन का कमाल…! दुनिया में विमान दुर्घटना का एक भी ऐसा मामला नहीं है कि एक भी यात्री हताहत न हुआ हो! जापान सागर के तट पर स्थापित परमाणु ऊर्जा का प्लांट भी सुरक्षित रहा। दरअसल जापान से सभी को सबक सीखने चाहिए। वहां भूकंपरोधी इमारतों की मुख्यत: तीन श्रेणियां हैं।

इमारतों की नींव में रबड़ के पैड्स और प्लेटफॉर्म इस तरह बनाए जाते हैं कि कितने भी तीव्र भूकंपों में इमारतें झूल सकती हैं, लेकिन उनके ध्वस्त होकर गिरने की दर बहुत कम है। जापानी नागरिक इमारतों संबंधी कानूनों का पूर्णत: पालन भी करते हैं। उनकी सोच है कि नियमानुसार इमारत बनाने से वे खुद, उनके परिजन और मित्र सुरक्षित रह सकते हैं। भारत में बहुमंजिला इमारतों के निर्माण में कोताही और भ्रष्टाचार खूब हैं।

भारत ऐसे भूकंप और प्रलय झेल चुका है, जिनमें हमारे निर्माण मिट्टी और मलबा हुए हैं। पिछली बारिशों में पहाड़ी इलाकों में घर-मकान ताश के पत्तों की तरह बिखर कर ढहे थे, जो लापरवाही और भ्रष्टाचार के साक्षात उदाहरण हैं। अब भी सब कुछ रामभरोसे चल रहा है। भारत में करीब 8 की तीव्रता वाले भूकंप बहुत कम आए हैं। फिर भी गुजरात का कच्छ और उत्तराखंड आदि के कुछ त्रासद मामले याद आते हैं।

पड़ोसी देश नेपाल के विनाशकारी जलजलों को कौन भूल सकता है? जलजलों और विनाश को झेलना तो जापान की नियति रही है। सुनामी की लहरें तो इस बार भी उठी थीं, लेकिन संकट टल गया। अलबत्ता जापान के नोटो इलाके में जमीन 1.3 मीटर पश्चिम की तरफ खिसक चुकी है। कई राजमार्गोंऔर सडक़ों में चौड़ी-चौड़ी दरारें पड़ चुकी हैं।

रेलवे स्टेशन इतना हिल रहा था कि लोगों ने उसे भी ‘असुरक्षित’ माना। जलजलों के बावजूद जापान का तकनीकी व प्रौद्योगिकी विकास अतुलनीय है।

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