Father….An untold chapter. A heartwarming story of love and sacrifice. That should inspire every son to be good and concerned about the duties he hold towards his
रात काफी गहरी हो चली थी। घड़ी की सुइयां साढ़े दस बजा रहीं थीं और अब शहर की सड़कों पर धीरे-धीरे सन्नाटा उतरने लगा था। फैक्टरी की मशीनों की तेज आवाज के बीच आदित्य अपनी दूसरी शिफ्ट पूरी कर रहे थे। पसीने से भीगा उनका चेहरा थकान से भरा था, मैले-कुचैले से कपड़े, लेकिन आंखों में एक अजीब-सी चमक थी-अपने बेटे साहिल के भविष्य की चमक। तभी उनके बटन वाले छोटे से पुराने मोबाइल की घंटी बजी। उन्होंने मशीन बंद कर जेब से मोबाइल निकाला।
हैलो पापा ! उधर से साहिल की आवाज आई।
हाँ बेटा, बोलो।
नमस्ते पापा, वो मैंने आपको इसलिए फोन किया कि मैं अपने लिए ढाई हजार के जूते और दो जींस की पैंट तथा तीन शर्ट ऑर्डर कर रहा हूँ। पापा ! मैं जिस कोचिंग में जाता हूं वहां सभी बच्चे रोज़ नए-नए कपड़े पहनकर आते हैं। मुझे पुराने जूतों और कपड़ों में असहजता महसूस होती है।
कुछ पल के लिए आदित्य चुप हो गए। उनकी नजर अपने फटे तथा घिसे हुए जूतों पर गई, जिनकी सिलाई कई जगह से उधड़ चुकी थी। शर्ट का कॉलर भी घिस चुका था। पिछले तीन सालों से वही जूते और वही पुराने कपड़े वह पहन रहे थे।
लेकिन अगले ही पल उन्होंने मुस्कराकर कहा- कोई बात नहीं बेटा, तुम कल ऑर्डर कर दो। सात-आठ हजार रुपए की ही तो बात है। मैं कहीं से अरेंज कर दूँगा। बस तुम अच्छी तरह पढ़ना। तुम्हारी खुशी से बढ़कर मेरे लिए कुछ भी नहीं है बेटा !

थैंक यू पापा! कहकर साहिल ने फोन रख दिया। आदित्य ने गहरी सांस ली। उन्होंने खाना भी अभी तक नहीं खाया था और उनकी जेब में केवल बारह सौ रुपए थे। महीने का किराया बाकी था, दूध के पैसे भी दूध वाले को चुकाने थे और घर में राशन भी कम था, लेकिन बेटे की खुशी के आगे उन्हें अपनी हर परेशानी छोटी लगती थी।
फैक्टरी से लौटते समय देर रात तक खुली उन्होंने चाय की एक थड़ी पर बैठकर घर से कपड़े में बांध कर लाई दो सूखी रोटियां और चाय से पेट भरा। साथी मजदूर सुरेश ने उनसे पूछा-आदित्य, कब तक अपने पेट के गांठ लगाते रहोगे ? तुम दिन-रात जी-तोड़ मेहनत करते हो। बच्चों की सभी इच्छाओं की पूर्ति के लिए कब तक आखिर खुद को यूँ तकलीफ देते रहोगे? कभी तो थोड़ा-बहुत अपने लिए भी सोच लिया करो।
आदित्य के सूखे लबों पर हल्की-सी मुस्कराहट थी-हम जैसे बाप अपने लिए कहाँ जीते हैं सुरेश… हमारी खुशी तो बच्चों के सपनों में निहित होती है। और हमारा क्या है, हमें तो कम में जीने की आदत पड़ चुकी है।

घर पहुँचते-पहुँचते रात के बारह बज चुके थे। उनकी पत्नी ज्योत्स्ना दरवाजे पर उनक बड़ी देर से इंतजार कर रही थी। आज बहुत देर लगा दी। इतनी देर कहां हुई ? खाना लगा दूँ आपके लिए, भूख लगी होगी? नहीं, घर से जो रोटियां बांधकर दीं थीं, खा लिया बाहर।
ज्योत्स्ना समझ गई कि उन्होंने फिर झूठ बोला है। वह जानती थी कि आदित्य अक्सर पैसे बचाने के लिए भूखे ही रह जाते हैं। यहां तक कि चाय भी बहुत बार नहीं पीते हैं। अगले दिन आदित्य ने फैक्टरी मालिक से एडवांस मांगा, लेकिन मालिक ने साफ मना कर दिया और कहा-आदित्य अभी तो महीना पूरा भी नहीं हुआ, और तुम्हें काम से पहले ही दाम चाहिए। निराश होकर वे बाहर निकले। तभी उनकी नजर अपनी पुरानी स्कूटी पर पड़ी। वही स्कूटी जिससे वे वर्षों से फैक्टरी जाते थे।
उन्होंने बिना कुछ सोचे अपनी बरसों पुरानी स्कूटी बेच दी।
अगले दिन साहिल के खाते में पैसे पहुँच चुके थे। चार-पांच दिन बाद साहिल के पास नए जूते, जींस और शर्ट आ गए। वह खुशी से दोस्तों के बीच घूम रहा था। पहली बार उसे लगा कि अब वह भी किसी से कम नहीं है। उसके पापा उसका कितना ख्याल रखते हैं। लेकिन उसी शाम उसने अपने पिता को देखा।
आदित्य फैक्टरी पैदल ही जा रहे थे। पैरों में टूटे हुए जूते थे, जिनमें से अंगूठा बाहर झाँक रहा था।शर्ट में दो-तीन छोटे छेद नज़र आ रहे थे।
पापा… आपकी स्कूटी कहाँ है? साहिल ने पूछा।
आदित्य थोड़ा झिझके-अरे बेटा, वो बहुत पुरानी हो गई थी…ठीक से काम भी नहीं करती थी और पेट्रोल भी बहुत फूंक रहीं थीं, इसलिए मैंने बेच दी।
लेकिन फैक्टरी?
अरे ! तुम चिंता मत करो।
बिलकुल पास ही में तो है… चला जाता हूँ पैदल। और तुम्हें तो पता ही है कि पैदल चलना हमारे स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है।
साहिल कुछ देर तक चुप रहा। उसकी नजर पिता के चेहरे पर टिक गई। थकान से भरा चेहरा, माथे पर पसीना, लेकिन होंठों पर वही सुकून भरी मुस्कान।

उस रात साहिल को ठीक से नींद भी नहीं आई। उसे याद आने लगा कि कैसे उसके पिता हर बार उसकी जरूरत पूरी करते रहे। बचपन में खिलौने, स्कूल की फीस, कोचिंग, किताबें… हर चीज समय पर मिली। लेकिन उसने कभी यह नहीं सोचा कि उसके पिता अपनी जरूरतों का क्या करते होंगे। उनकी भी तो अपनी कुछ इच्छाएं होंगी।
अचानक उसे अपनी माँ की कही बात याद आई- बेटा, पिता कभी जताते नहीं, लेकिन परिवार के लिए रोज थोड़ा-थोड़ा टूटते जरूर हैं। याद रखो बेटा ! एक पिता परिवार का वटवृक्ष होता है, जिसकी शीतल छांव में परिवार पलता है, बढ़ता है। अगली सुबह साहिल ने अपने नए जूतों का डिब्बा खोला। कुछ देर उन्हें देखा और फिर वापस ज्यों का त्यों वापस डिब्बे में पैक कर दिया। उसने ऑनलाइन जाकर ऑर्डर कैंसिल कर दिया। जितने पैसे वापस मिले, उनसे उसने अपने पिता के लिए नए जूते और कपड़े ऑर्डर कर दिए।

साथ में एक छोटा-सा पत्र भी लिखा-पापा, मैं शायद कभी समझ ही नहीं पाया कि आप मेरे लिए कितना सहते हैं। मुझे पता है कि फैक्ट्री बहुत दूर है। मैं सबकुछ समझता हूं। आपने हमेशा मेरी ही खुशी देखी, हम सब की खुशियां देखीं, लेकिन मैंने कभी आपकी थकान नहीं देखी, आपके कष्ट, दुःख और तकलीफें नहीं देखीं। आपने अपने सपनों को रोककर मेरे सपनों को उड़ान दी। अपने पंखों को काटकर आपने हमारे पंखों को तैयार किया। अब मुझे समझ आया कि पिता केवल एक रिश्ता नहीं, पूरा आसमान होते हैं।
पापा ! मुझे माफ कर देना। मैं इस संसार की हवाओं में बह गया था,जो सिर्फ और सिर्फ अपना ही स्वार्थ देखता है। पापा ! आप इस दुनिया के सबसे अमीर इंसान हैं, क्योंकि आपके पास त्याग है, विशाल हृदय है और प्रेम का अद्भुत खजाना है।
कुछ दिन बाद जब आदित्य के हाथ में नया जूतों का डिब्बा व नया पेंट-शर्ट आया तो वे हैरान रह गए। अरे ! ये किसने भेजा? कहीं फैक्ट्री मालिक ने तो नहीं।
ज्योत्स्ना मंद-मंद सी मुस्कराई- जी नहीं, यह आपके बेटे ने आपके लिए भेजा है। डिब्बे में रखा पत्र पढ़ते-पढ़ते आदित्य की आंखें नम हो गईं। शायद पहली बार उन्हें लगा कि उनका संघर्ष किसी ने समझा है।

उस रात साहिल ने फोन पर कहा-पापा, अब मैं सिर्फ अच्छे कपड़े और जूते पहनने के लिए नहीं पढ़ूँगा। मैं इतना बड़ा इंसान बनूँगा कि आपको फिर कभी अपनी जरूरतें छिपानी न पड़ें। मैं कम में ही गुजारा कर लूंगा। मुझे दुनिया का ऐशा-आराम नहीं चाहिए। बिलकुल भी नहीं। इतना त्याग ! पापा !
आदित्य की आंखों से आँसू बह निकले। उन्होंने कांपती आवाज में अंदर ही अंदर जैसे स्वयं से कहा- बस बेटा, यही मेरी सबसे बड़ी कमाई है।
सच ही तो है- पिता रोटी है, कपड़ा है, मकान है। पिता छोटे से परिंदे का बड़ा आसमान है। वह अपने बच्चों के लिए हर दर्द सह लेता है, बिना किसी गिले और शिकायत के। पिता कभी अपने प्रेम का प्रदर्शन नहीं करता, वह बाहर से नारियल की भांति बहुत कठोर नज़र ज़रूर आता है, लेकिन उसका दिल नारियल की सफेद गिरि की भांति कोमल और मीठा होता है।

एक पिता का पूरा जीवन ही त्याग और समर्पण की कहानी होता है। सच है, इस दुनिया में मां-बाप का स्थान कोई भी नहीं ले सकता है। उनके त्याग की कीमत कभी चुकाई नहीं जा सकती। इसलिए जब तक वे हमारे साथ हैं, उनके प्रेम, संघर्ष और सम्मान को समझना ही संतान का सबसे बड़ा धर्म है।