Exclusive – Pakistan update

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Symbol of Islamic Terror and Jehad Pakistan is now enjoying its own pill. There were more than 990 terror attacks and 1126 deaths. Pakistani public is running for life and basic needs. Its a country standing on the brink of split. Next two years are going to be decisive for this country of Islamic jihadis. More likely Pakistan will become history with divided regions like Balochistan, Sindh and minion pakistan. US, UAE, Arab Emirates will be of no help. कश्मीर के लिए पाली गई आतंकी फैक्टरी अब पाकिस्तान को ही निगल रही

“आठ महीने में 990 आतंकी हमले और 1126 मौतों ने बढ़ाई चिंता”

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा के कोहाट में सेना और आतंकियों के बीच करीब 20 घंटे चली मुठभेड़ में आठ आतंकी मारे गए। यह घटना पाकिस्तान में तेजी से बढ़ रही आतंकी हिंसा की उस तस्वीर का हिस्सा है, जिसमें आतंकवादी संगठन लगातार सुरक्षा बलों और नागरिकों के लिए चुनौती बने हुए हैं। कोहाट की घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि आतंकवाद को लंबे समय तक रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने वाला पाकिस्तान अब स्वयं उसी आतंक की आग में क्यों झुलस रहा है।

पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट एंड सिक्योरिटी स्टडीज के आंकड़े बताते हैं कि जनवरी से अगस्त 2026 तक पाकिस्तान में 990 आतंकी हमले हुए और इनमें 1126 लोगों की मौत हुई। आठ महीनों के आंकड़े यह बताते हैं कि आतंकवाद पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा के लिए लगातार बड़ा खतरा बना हुआ है। अगस्त में 199 हमले दर्ज किए गए, जो इस वर्ष के शुरुआती आठ महीनों में किसी एक महीने में सबसे अधिक हैं।

आंकड़ों पर नजर डालें तो जनवरी में 87 आतंकी हमले हुए और 105 लोगों की मौत हुई। फरवरी में 83 हमलों में 139 लोगों की जान गई। मार्च में 106 हमलों में 146 मौतें दर्ज की गईं। अप्रैल में 85 हमले हुए और 60 लोगों की मौत हुई। मई में 160 हमलों में 128 लोगों की जान गई। जून में 112 हमले हुए और 118 मौतें दर्ज की गईं। जुलाई में 144 हमलों के साथ 268 मौतें हुईं, जबकि अगस्त में 199 हमलों में 158 लोगों की जान गई।

कश्मीर के नाम पर तैयार *आतंक का खेल अब पाकिस्तान पर भारी*

पाकिस्तान ने लंबे समय तक जम्मू-कश्मीर में भारत विरोधी आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले संगठनों को पनाह देने के आरोपों का सामना किया है। कश्मीर को भारत से अलग करने के उद्देश्य से आतंकवादी संगठनों का इस्तेमाल करने की नीति ने लंबे समय तक क्षेत्र में हिंसा को जन्म दिया। आतंकवादियों ने नागरिकों और सुरक्षा बलों को निशाना बनाया और इसके कारण जम्मू-कश्मीर में बड़ी संख्या में लोगों को जान गंवानी पड़ी।

लेकिन आतंकवाद की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि वह जिस दिशा में भेजा जाता है, वहीं तक सीमित नहीं रहता। पाकिस्तान में आज तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान, बलूच उग्रवादी संगठन और इस्लामिक स्टेट से जुड़े गुटों की हिंसक गतिविधियां वहां की सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई हैं। खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान आतंकवादी हिंसा के प्रमुख केंद्र हैं और इन क्षेत्रों में सुरक्षा बलों को लगातार अभियान चलाने पड़ रहे हैं।

कहते हैं कि बोए पेड़ बबूल के तो आम कहां से खाएं। कश्मीर को हड़पने के लिए पाकिस्तान ने जिस आतंकवादी ढांचे को वर्षों तक सहारा दिया, उसका दुष्परिणाम आज पाकिस्तान के भीतर दिखाई दे रहा है। आतंकवादियों ने पाकिस्तान के नागरिकों, पुलिसकर्मियों और सुरक्षा बलों को भी निशाना बनाया है। जिस आतंकवाद को कभी दूसरे देश के खिलाफ इस्तेमाल करने का माध्यम समझा गया, वही अब पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा को कमजोर करने वाला बड़ा कारण बन रहा है।

आतंकवाद को किसी देश की नीति का औजार बनाना अंततः उसी देश के लिए संकट पैदा कर सकता है। जब आतंकवादी संगठनों को संरक्षण, संसाधन या सुरक्षित ठिकाने मिलते हैं तो उनके लिए लक्ष्य की सीमा तय रखना कठिन हो जाता है। एक संगठन दूसरे संगठन से जुड़ता है और अलग-अलग गुट अपने हितों के अनुसार हिंसा का रास्ता अपनाते हैं। पाकिस्तान में उभरती आतंकी चुनौती इसी जटिल स्थिति को दर्शाती है।

*आंकड़े बता रहे पाकिस्तान में बढ़ता आतंकवाद*

पाकिस्तान में 2026 के आंकड़ों का सबसे चिंताजनक पहलू हमलों की लगातार ऊंची संख्या है। आठ महीनों में 990 हमलों का अर्थ है कि औसतन हर महीने सौ से अधिक आतंकी घटनाएं दर्ज हुईं। अगस्त में 199 हमलों के साथ हिंसा का आंकड़ा सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचा। जुलाई में 268 मौतों का आंकड़ा बताता है कि कम संख्या में हुए हमले भी कई बार अत्यधिक घातक साबित हुए।

आतंकी हमलों में हुई मौतों और आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षा अभियानों में हुई मौतों को अलग-अलग समझना जरूरी है। सुरक्षा अध्ययन संस्थाओं के आंकड़ों में कई बार आतंकवादी हमलों के साथ जवाबी कार्रवाई में मारे गए आतंकियों और सुरक्षा अभियानों में हुई अन्य मौतों को भी व्यापक संघर्ष आंकड़ों में शामिल किया जाता है। इसलिए अलग-अलग रिपोर्टों में कुल मौतों के आंकड़े अलग दिखाई दे सकते हैं।

उदाहरण के तौर पर जनवरी 2026 में आतंकी हमलों में 105 लोगों की मौत दर्ज की गई थी। वहीं आतंकवादी हिंसा और सुरक्षा अभियानों को मिलाकर व्यापक संघर्ष आंकड़ा 361 मौतों तक पहुंचा था। इसमें 242 आतंकी, 73 नागरिक और 46 सुरक्षा बलों के जवान शामिल बताए गए। जुलाई में आतंकवादी हिंसा और सुरक्षा अभियानों को मिलाकर 606 मौतों का आंकड़ा सामने आया। इनमें 401 आतंकी, 112 सुरक्षा बलों के जवान, 74 नागरिक और 19 शांति समितियों से जुड़े लोग शामिल थे।

वर्ष 2026 के शुरुआती चार महीनों में भी पाकिस्तान में 401 आतंकी हमले दर्ज किए गए थे। इस अवधि में 190 नागरिकों और 158 सुरक्षा बलों के जवानों की मौत का आंकड़ा सामने आया। सुरक्षा अभियानों में 988 आतंकियों के मारे जाने की जानकारी भी दी गई थी। ये आंकड़े बताते हैं कि पाकिस्तान में आतंकवाद केवल हमलों की संख्या का विषय नहीं है, बल्कि उसके खिलाफ चल रहे सैन्य और सुरक्षा अभियानों ने भी देश के कई हिस्सों में संघर्ष की स्थिति पैदा कर दी है।

वैश्विक आतंकवाद सूचकांक 2025 में पाकिस्तान को दुनिया में आतंकवाद से दूसरे सबसे अधिक प्रभावित देश के रूप में रखा गया था। रिपोर्ट में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान की हिंसक गतिविधियों में बड़ी वृद्धि का उल्लेख किया गया था। 2024 में इस संगठन से जुड़े 482 हमलों में 558 लोगों की मौत का आंकड़ा दिया गया था। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी और अन्य उग्रवादी संगठनों की गतिविधियों में भी वृद्धि दर्ज की गई थी।

पाकिस्तान के सामने आज आतंकवाद की चुनौती केवल सीमा से जुड़ी समस्या नहीं रह गई है। यह देश की आंतरिक सुरक्षा, नागरिक जीवन और सामाजिक स्थिरता से जुड़ा विषय बन चुका है। आतंकवादी हिंसा का बढ़ता आंकड़ा यह भी दिखाता है कि वर्षों तक आतंकवाद को अलग-अलग उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करने की नीति ने पाकिस्तान के सामने कितनी जटिल स्थिति पैदा कर दी है।

कश्मीर के खिलाफ आतंकवाद का इस्तेमाल करने की नीति से भारत को लंबे समय तक चुनौती मिली, लेकिन आतंकवाद को संरक्षण देने का असर पाकिस्तान पर भी पड़ा। आज वहां के नागरिक उसी हिंसा के शिकार हो रहे हैं जिसे कभी भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश की गई थी। पाकिस्तान में लगातार बढ़ती आतंकी घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि आतंकवाद को किसी सीमा में बांधकर रखना संभव नहीं होता।

कोहाट में आठ आतंकियों का मारा जाना एक घटना भर है, लेकिन उसके पीछे छिपे आंकड़े कहीं बड़ी तस्वीर सामने रखते हैं। आठ महीनों में 990 हमले और 1126 मौतें पाकिस्तान की गंभीर सुरक्षा चुनौती को दर्शाती हैं। कश्मीर के नाम पर तैयार किया गया आतंक का ढांचा अब पाकिस्तान की अपनी धरती पर ही हिंसा फैला रहा है। इसलिए यह कहावत पाकिस्तान की मौजूदा स्थिति पर सटीक बैठती है कि बोए पेड़ बबूल के तो आम कहां से खाएं। आतंक का सहारा लेकर किसी दूसरे को नुकसान पहुंचाने की कोशिश अंततः अपने ही समाज की शांति और सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है।

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