Poem – मैं नहीं हूँ परफेक्ट…

WhatsAppFacebookTwitterLinkedIn

मैं नहीं हूँ परफेक्ट…

और शायद यही मेरी सबसे बड़ी सच्चाई है।

मेरे भीतर कमियाँ हैं,

कुछ दिखती हैं, कुछ छिपी रहती हैं,

और कुछ ऐसी हैं जिन्हें मैं आज भी समझने की कोशिश कर रही हूँ।

मैं कभी सही शब्द नहीं चुन पाती,

कभी सही समय पर चुप नहीं रह पाती,

कभी ज़रूरत से ज़्यादा महसूस कर लेती हूँ,

और कभी ज़रूरत से कम व्यक्त कर पाती हूँ।

मेरे निर्णय भी हमेशा सधे हुए नहीं होते,

मेरे भाव भी अक्सर मेरी समझ से आगे निकल जाते हैं।

लेकिन इन सबके बीच

मैं ठहरी नहीं हूँ।

मैं हर दिन थोड़ा सीख रही हूँ…

अपनी कमज़ोरियों से,

अपने पछतावों से,

और उन लोगों से भी

जो मुझे जाने-अनजाने आईना दिखा जाते हैं।

मैं यह नहीं कहती कि मैं बदल चुकी हूँ,

पर यह ज़रूर कह सकती हूँ कि

मैं बदलने की प्रक्रिया में हूँ।

और यही प्रक्रिया मुझे जीवित रखती है।

परफेक्ट होना शायद आसान होता,

गलती न करना भी।

लेकिन फिर संवेदना कहाँ से आती?

धैर्य कहाँ से जन्म लेता?

और इंसान, इंसान कैसे बनता?

मैं अपनी कमियों से भागती नहीं,

ना ही उन्हें सजाकर पेश करती हूँ।

मैं उन्हें स्वीकार करती हूँ…

क्योंकि स्वीकार ही पहला कदम होता है

सीखने की ओर।

अगर कभी मैं शांत दिखूँ,

तो यह मत समझना कि मेरे भीतर उथल-पुथल नहीं है।

और अगर कभी मैं लड़खड़ाऊँ,

तो यह मत समझना कि मैं गिर गयी हूँ।

मैं बस रुककर

अपने आप को फिर से समझ रही हूँ।

मैं परफेक्ट नहीं हूँ,

पर मैं ईमानदार हूँ…

अपने भावों के प्रति,

अपने रिश्तों के प्रति,

और अपने बनने की यात्रा के प्रति।

और शायद जीवन का अर्थ भी यही है—

परफेक्ट बन जाना नहीं,

बल्कि हर दिन

थोड़ा और मानवीय बनते जाना।

Share Reality:
WhatsAppFacebookTwitterLinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *