Dharm -भविष्य पुराण कथा

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ब्राह्मण ने दी खीर, सांप ने किया जहरीला, खीर खाकर मरा एक सन्यासी तो ब्रह्महत्या क्या दोषी कौन ?

Ved and Puran are pillars of Sanatan dharma. We have very distinct knowledge in all the manuscripts for human development and better social spiritual living. Many of them are in poetry, fiction and story telling format where the muni;s have given examples of living real characters and circumstances to convey a msg. to the general beings. These stories are so directional and guiding hindus from thousands of years. Here is one from Bhavishaya Puran as referred by Betala and King Vikramaditya. – Dr. Ranjit Singh

पुराणों का संकलन कब हुआ पुराणों की रचना एक समय की नहीं है, लगभग श्रुतिकाल से लेकर बारहवीं शताब्दी तक निरन्तर उनकी रचना, संक्षिप्त संस्करण, सम्पादन ओर संकलन होता गया। विद्वानों की राय है कि गुप्त-शासन की सर्वथा अनुकूल परिस्थितियों को पाकर उस समय पुराणों का एक संस्करण हुआ . ऐसा माना जाता है कि भविष्य पुराण’ का पारायण और रचना मग ब्राह्मणों द्वारा की गई है। ये मग ब्राह्मण बृहत्तर भारत के ईरान प्रांत के पुरोहित थे, जो हजारों साल पहले भारत आकर बस गए थे। इन्हें सूर्य के उपासक माना जाता है। सूर्य की उपासना वैदिक काल से भारत में होती रही है।

देश के नंबर वन तंत्र मंत्र यंत्र शास्त्र के ज्ञाता डॉक्टर रंजीत सिंह जी से आप सीधे जुड़ सकते हैं इनके यूट्यूब चैनल के माध्यम से। डॉक्टर रंजीत सिंह जी विगत 20 वर्षों से तंत्र शास्त्र के क्षेत्र में शिक्षा, दीक्षा एवं साधना, चिकित्सा के भी निशुल्क शिविर आयोजित कर हजारों साधकों और दुखी जन के कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। और अपनी निगरानी में बेहद कठिन और असंभव मानी जाने वाली दुर्लभ साधनाओं के महारथी हैं। 

प्राचीन पुराणों के रचनाकार ब्रह्म को ही कहा जाता है। सृष्टि अनादिकाल से चल रही है। अनन्त बार सृष्टि का सृजन और प्रलय हो चुका है।एक ही समय में अनन्त ब्रह्माण्ड रहते हैं, उत्पन्न (सृजित) और लय (प्रलय) होते रहते हैं।इन सबका इतिहास और पुरानी व्यवस्थाओं का विवरण पुराण होते हैं। आदि सृजन से अनन्त भविष्य में होने वाली अन्तिम सृष्टि का सम्पुर्ण ब्योरा पुराण कहलाता है। वेदों के साथ ही ये पुराण ऋषियों के अन्तःकरण में ही प्रकट होते हैं। ये कोई पुस्तकों में सम्पादित नही है।

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ऐसा कहा जाता है कि हर युग में कोई व्यास उस युग के लिए वेदों को संहिताबद्ध (व्यास) करते हैं और इतिहास / पुराण की रचना करते हैं। व्यास पद है नाम नही। वेद और पुराणों के लेखक वेद व्यास है. साथ हि महाभारत के लेखक भी वेद व्यास है. इन्हे भगवान विष्णु का सत्तरहवाँ अवतार माना गया है. आज भी कथा भागवद कहने वाले कथा वाचक ज़िस स्थान पर विराजमान होते है सभा मैं कथा कहते है उस स्थान को व्यास गद्दी कहते है. अतः यह इनके ज्ञान और सम्मान का सूचक है. इनको भगवान विष्णु का अवतार मानने का मुख्य कारण इनके द्वारा वैदिक साहित्य के संकलन हि है.

महाभारत को जय सम्हिता के नाम से लिखा और इसमें 8800 संस्कृत के कुल श्लोक थे. धीरे धीरे ये बढ़कर एक लाख हो गए. महाभारत का लेखन कार्य भगवान श्री गणेश ने बद्रीक्षश्रम माना उत्तराखण्ड मैं किया था. आज भी यहां व्यास गुफा है जिसमे व्यास गद्दाफी है और एक बहोत विशाल पुस्तक एक अति विशालकाय पत्थर के रूप मैं विराजमान है. जोंके द्वारा लिखें गए ग्रंथों और इनके ज्ञान का पर्याय या प्रमाण है. जय सम्हिता को फिर अलग अलग ऋषियों ने दुबारा लिखा तो इसमें श्लोक बढ़ते गए. चार वेद अठारह पुराण और 18 हि उप पुराण है. पुराण मुख्यतया भारत कीमहाँ राजाओं का इतिहास है वंशावली है. इनमे भगवानो ब्रह्मा भगवान विष्णु और भगवान शिव तथा देवी माता से भी सम्वन्धित महिमा है. ब्रह्मा जी से सम्वन्धित पुराणों की संलिए कम्हे. वेद व्यास ने भागवद पुराण भी लिखा है जिसमे श्री कृष्ण के महिमा का वर्णन है.

इस पुराण के लेखन के उपरांत हि वेद व्यास ने लेखन कार्य समापन कोयन अन्यथा इनको अपने कार्य से संतुष्टि नहीं मिली थी. इस पुराण के लेखन उपरंत हि वेद व्यास शांत हुए और अपने अनेक शिष्यों को इन्होने ज्ञान दिया. इनके पुत्र शुकदेव भागवद पुराण के सही विवेचक थे. शुकदेव किसी भी ज्ञान को विल्कुल तोते की तरह कर लेते थे ज़िस भाव मैं जिन भावना के साथ उन्होंने सुना उसी तरह सुना सकते थे. इन्होने श्रीमद भागवद कथा का वचन पांडव राज महाराज परीक्षत के लिए किया. गंगा कैबरे शुक्रताल तीर्थस्थल मुजफ्फरनगर मैं.

उपनिषदों के लेखक अलग अलग है. इसी तरह शास्त्रों के लेखक भी विभिन्न ऋषि मुनि है.

द्वापर युग के अन्त में पाराशर के पुत्र कृष्णद्वैपायन व्यास के अन्तःकरण में इतिहास- पुराण का बोद हुआ। उनके द्वारा पुराणों का सम्पादन किया गया। किन्तु वे पुराण अब मूल रुप में उपलब्ध नही है।

पुष्यमित्र शुंङ्ग से लेकर गुप्तकाल तथा धारा नगरी के राजा भोज तक बौद्ध जैन मत में गये कुछ ब्राह्मणों ने बौद्ध संस्कारों के अनुकूल कुछ पुराण लिखे। ये पुराण ही वर्तमान में उपलब्ध हैं। इन पुराणों में विष्णु पुराण पाराशर जी की रचना माना जाता है और शेष सत्रह पुराण वेदव्यासजी कृत माने जाते हैं। किन्तु अलग-अलग पुराणों में इतना मतभेद है कि कोई भी एक व्यक्ति तो ठीक एक परिवार की रचना होना भी नही माना जा सकता।

मेरा मानना है कि भारत में श्रुति और स्मृति की एक स्वस्थ परंपरा रही है। कोई ऋषि, ज्ञानी, पंडित अपने आश्रम में बैठने की जिस गद्दी पर बैठता था उसे व्यास कहा जाता है। इसलिए महर्षि व्यास के अलावा व्यास की एक परंपरा अभी तक चली आ रही है। और इन्हीं लोगों ने भारत में ज्ञान विज्ञान धर्म अध्यात्म से जुड़े सभी ग्रंथों का निर्माण और रचना की .

सहस्त्रों वर्ष पूर्व रए गए इस पुराण के प्रतिसर्ग पर्व में ईसा के 2000 वर्षों की अचूक भविष्यवाणियां हैं। इसकी विषय सामग्री देखकर मन बेहद आश्चर्य से भर उठता है। भविष्य के गर्भ में दबे घटनाक्रम और राजाओं, सन्तों, महात्माओं और मनीषियों के बारे में इतना सटीक वर्णन अचम्भित कर देता है।

इसमें नन्द वंश एवं मौर्य वंश के साथ-साथ शंकराचार्य, तैमूर, बाबर, हुमायूं, अकबर, औरंगजेब, पृथ्वीराज चौहान तथा छत्रपति शिवाजी के बारे में बताया गया है। वर्ष 1857 में इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के भारत की साम्राज्ञी बनने और अंग्रेजी भाषा के प्रसार से भारतीय भाषा संस्कृत के विलुप्त होने की भविष्यवाणी भी इस ग्रन्थ में की गई है

वेद क्या है ?

वेद न केवल भारत अपितु सम्पूर्ण संसार के सबसे प्राचीन ग्रन्थ हैं । वेद सनातन धर्म के सबसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ हैं और संसार के सबसे पुराने दस्तावेज भी हैं । वेदों के उल्लेख को वैज्ञानिकों ने भी सही माना है । ऐसा कहा जाता है कि वेदों से ही विश्व के अन्य धर्मों की उत्पत्ति हुई । और लोगों ने अपनी अपनी भाषा और ढंग में वेदों के ज्ञान को अपने जीवन में उतारा । वेद शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के विद् शब्द से हुई है जिसका अर्थ है ज्ञान।

पुराण क्या हैं

पुराणों की संख्या कुल मिलाकर 18 है । ऐसी भी मान्यता है कि वेदों को लिखित रूप में लाने के बाद भी सभी श्लोकों में लगभग 100 करोड़ श्लोक बच गए थे । इन श्लोकों का संकलन वेद व्यास द्वारा किया गया । जिसमे से मुख्य 18 संकलनो को पुराण कहा गया, इसके बाद लगभग 18 उपपुराण लिखे गए । और इनके अतिरिक्त बचे हुए श्लोकों को लेकर 28 उपपुराण और भी लिखे गए । मुख्य 18 पुराणों में 6 पुराण ब्रह्मा, 6 विष्णु और 6 महेश को समर्पित हैं ।

कथा

रुद्र किंकर यानी वेताल ने विक्रमादित्य से कहा– राजन ! चूड़ापुर नगर में राजा चूड़ामणि का राज था. उनकी रानी विशालाक्षी बड़ी पतिव्रता स्त्री थीं किंतु रानी संतानहीन थीं इसलिए दुखी रहती थीं. रानी ने भगवान शंकर की आराधना की.

महादेव की कृपा से उनकी कामना पूरी हुई और ऋकामदेव के समान एक सुंदर बालक हुआ. बालक को देख कर लगता था कि इसमें देवताओं का अंश समाया है. उसका नाम रखा गया हरिस्वामी.

राजा को धन वैभव की क्या कमी! इन सबका उपभोग कर हरिस्वामी पृथ्वी पर देवता के समान सुख भोग रहा था. देवल मुनि के शाप से शापित एक अप्सरा ने धरती पर स्त्री रूप में जन्म लिया. उसका नाम रूपलावण्यि था.

उसी अप्सरा से राजकुमार हरिस्वामी का विवाह हुआ. एक रात हरिस्वामी की पत्नी अपने भवन में सो रही थी. तभी सुकल नामक गंधर्व वहां आया. वह रूपलावण्यि पर मोहित हो गया और उसने सोती हुई रानी का अपहरण कर लिया.

जब हरिस्वामी उठा तो अपनी पत्नी को ढूंढने लगा. राजमहल की सुरक्षा के बीच वह कहां गयी. उसके न मिलने पर वह व्याकुल हो मानसिक अशांत हो गया. हरिस्वामी पत्नी के वियोग में नगर छोडकर जंगल में चला गया.

सभी सुख सुविधा त्यागकर श्रीहरि के ध्यान में लीन हो गया. वह संन्यासी होकर भीख मांगने लगा. एक दिन संन्यासी बन चुका हरिस्वामी भिक्षा मांगने के लिए एक ब्राह्मण के घर आया. ब्राह्मण ने सन्यासी के सेवा में खीर प्रस्तुत की.

हरिस्वामी ने सोचा पहले नहा लूं फिर खीर ग्रहण करुंगा. सो खीर को लेकर वह स्नान करने नदी तट पर चला आया. खीर भरा लोटा उसने वहीं बरगद के पेड़ पर रखकर नदी में नहाने चला गया.

पेड़ के कोटर में एक सांप रहता था. उसने खीर में विष उगल दिया. सन्यासी हरिस्वामी स्नानकर लौटा और खीर खाई. कुछ ही कौर के बाद विष के प्रभाव से हरिस्वामी को मूर्च्छा आने लगी.

हरिस्वामी उसी अवस्था में उस ब्राह्मण के घर तक पहुंचा और ब्राह्मण से बोला ,– ‘अरे दुष्ट ब्राह्मण ! तुम्हारे द्वारा दिये गये विष मिले हुए खीर को खाकर अब मैं तो मर रहा हूँ लेकिन इस अपराध में तुम्हें भी ब्रह्म हत्या का पाप अवश्य लगेगा.

संन्यासी बने पत्नी वियोगी हरिस्वामी ने ब्राह्मण को बहुत बुरा भला कहा और यह चेतावनी देकर मर गया. जंगल में श्री हरि की मन से की गयी आराधना फलीभूत हुई और हरिस्वामी तपस्या के प्रभाव से शिवलोक चला गया.

अब वेताल बने रुद्र किंकर ने विक्रमादित्य से प्रश्न किया – राजन ! ब्राह्मण ने खीर दिया और सर्प ने उसे विषमय किया जिससे सन्यासी मरा अब इनमें ब्रह्महत्या का पाप किसको लगेगा? यह मुझे बताओ.

राजा ने विस्तार से उत्तर दिया– विषधर नाग ने अज्ञानवश उस खीर में विष उगला. यह तो सर्प का स्वाभाविक कर्म है, उसने जान बूझ कर किसी उद्देश्य विशेष से खीर में विष नहीं मिलाया. अत: ब्रह्महत्या का पाप उसे नहीं लगेगा.

संन्यासी हरिस्वामी भूखा था. भिक्षा मांगने ब्राह्मण के घर आया था, इसलिए वह ब्राह्मण के लिये अतिथि था. अतिथि देव-स्वरुप होते हैं अत: अतिथि धर्म का पालन करना, श्रध्दा से खीर बनाकर देना तो उसके कुल-धर्म के अनुकूल ही था.

अतिथि का अपमान भी ब्रह्महत्या के समान ही है. वह विष मिलाकर अन्न देता, तभी ब्रह्महत्या उसे लगती. पर ऐसा तो उसने किया नहीं फिर ऐसे में वह कैसे ब्रह्म हत्या का भागी बन सकता है? ब्राह्मण को ब्रह्म हत्या नहीं लगेगी.

बाकी बच गया संन्यासी हरिस्वामी. अपने किए गए शुभ अशुभ कर्मों का फल सब को अवश्य भोगना पड़ता है. हरिस्वामी की यह अकाल मृत्यु उसके जनम जन्मांतर में किये गये कर्मों कुकर्मों का ही फल रहा होगा. हरिस्वामी के मरने का कारण उसका खीर खाना तो एक बहाना था.

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