Special Report -कई मायनों में ख़ास और शानदार होगा 2024 का आगामी गुर्जर महोत्सव

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आ रहा है गुर्जर समाज का महाकुंभ  Gurjar Mahotsav 2024 on 23- 24- 25 December, 2024 at Surajkund Mela Ground Faridabad Haryana.

गुर्जर समाज के गौरवशाली इतिहास को मिल कर जानने और जीने का पर्व है यह महा महोत्सव जिसे कोई भी मिस नहीं करना चाहेगा । 

भारतीय संस्कृति में घुमंतू मस्तमौला, प्रकृति, भूमि और परंपरा के रक्षक, हर छेत्र में अग्रणी और कट्टर देशभक्त गुर्जर समाज ने अपना एक सम्मानित और उच्च कोटि का स्थान अर्जित किया है। देश विदेश में अपनी काबिलियत के बल पर आगे बढ़, देश की तरक्की और विकास के लिए जी जान से मेहनत करने वाला सुनहरा संप्रदाय, हिन्दू समाज का मजबूत स्तंभ गुर्जर संप्रदाय है। स्वतंत्रता संग्राम और उसके बाद वर्षों तक गुर्जर समाज के योगदान, देश, विधर्मियों से धर्म संस्कृति की रक्षा और विकास से जुड़े उनके कार्यों, तथ्यों को दबाया और छिपाया जाता रहा, ना उन्हें उचित स्थान दिया गया ना ही सम्मान। किंतु अब समाज के अग्रज गुर्जर एकता, संस्कृति और वैभवशाली परंपरा, हुनर, व्यंजन सब एक साथ ले कर आए है देश विदेश से आने वाले अनुमानतः 20लाख विजिटर राजधानी दिल्ली इंद्रप्रस्थ से सटे सूरजकुंड मेला ग्राउंड में 23, 24, 25 दिसंबर 2024 तीन दिन इस महा उत्सव के साक्षी बनेंगे। इस बार यह तीसरा सफल आयोजन है जिसकी प्रसिद्धि को देखते हुए और भी भव्य और दिव्य इंतजाम किए गए हैं । महोत्सव में चौतरफा सुरक्षा और सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। इसमें सभी का स्वागत है देश के गौरव का आप सभी हिस्सा बनिए । 

विगत दो वर्षों से अनवरत चल रहा  सांस्कृतिक समृद्धि का एक अद्वितीय समागम, जिसमें इस बार अनुमानतः प्रतिभाग करेंगे 20 लाख गुर्जर। 

भारत विविधता भरा एक ऐसा देश है जो विभिन्न जातियों, धर्मों और संस्कृतियों और परंपराओं से समृद्ध रहा है। इसके विभिन्न राज्यों में विविध उद्देश्यों से आयोजित होने वाले महोत्सव देश की विविधता को पुष्पों के एक सुगंधित गुलदस्ते के रूप में विश्व भर के सम्मुख प्रस्तुत करते हैं। साथ साथ एक-दूसरे को जानने और समझने का अवसर प्रदान करते हैं। गुर्जर समुदाय इसी पुष्प गुच्छ को अपनी आभा से सुशोभित करने वाला वह समुदाय है जिसने अपने प्राकृतिक और सांस्कृतिक स्वरूप को राजस्थान के ग्राम देवमाली की तरह मौलिक बनाए रखा है। गुर्जर महोत्सव इस समुदाय की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का एक ऐसा समारोह है जो इस समुदाय की सांस्कृतिक विरासत को उजागर तो करेगा ही उसको सहेजेगा भी। विभिन्न राज्यों में विस्तृत अपने समाज को यह महोत्सव एक साथ आने का ना सिर्फ अवसर देता है बल्कि विभिन्न राज्यों की सामाजिक विभूतियों को भी सबके समक्ष अपने हुनर रखने का मौका भी देता है।

पूर्व की भांति गुर्जर महोत्सव दिल्ली से जुड़े फरीदाबाद के सूरजकुंड मेला ग्राउंड में ही इस बार भी मनाया जा रहा है। गुर्जर महोत्सव यहां 23, 24 और 25 दिसंबर, 2024 को तीन दिन चलेगा।

गुर्जर संप्रदाय के इतिहास की झलक । आइए जानते हैं महान शासक महा पराक्रमी राजा मिहिर भोज जी के जीवन की कुछ विशेष उपलब्धियों एवं योगदान के विषय में। 

वीरों और योद्धाओं की जाति गुर्जर प्रतिहार रघुवंश शिरोमणि श्रीराम के अनुज लक्ष्मण के वंशज हैं. इस वंश में एक से एक महाभट योद्धा और पराक्रमी शासक हुए जिसकी जितनी चर्चा और प्रशंसा की जाये कम है. इसी गौरवशाली वंश में सम्राट मिहिर भोज का जन्म हुआ था. उन्होंने ८३६ ईस्वी से ८८५ ईस्वी तक कभी कन्नौज तो कभी उज्जैन से शासन किया. भले ही वामपंथी इतिहासकारों ने मिहिर भोज के इतिहास को काट देने की साजिश की है, मिहिर भोज क्या उन सभी महान भारतीय सम्राटों और योद्धाओं को भारतीय इतिहास से गायब कर दिया है जिन्होंने अरबी, तुर्की मुस्लिम आक्रमणकारियों को धूल चटाया और उन्हें अरब तक या भारतवर्ष की सीमा से बाहर खदेड़ दिया, लेकिन स्कंद पुराण के प्रभास खंड में सम्राट मिहिर भोज की वीरता, शौर्य और पराक्रम के बारे में विस्तार से वर्णन है.

मिहिर भोज बचपन से ही वीर बहादुर माने जाते थे. उनका जन्म विक्रम संवत 873 को हुआ था. सम्राट मिहिर भोज की पत्नी का नाम चंद्रभट्टारिका देवी था जो भाटी राजपूत वंश की थी. मिहिर भोज की वीरता के किस्से पूरी दुनिया मे मशहूर हुए. कश्मीर के राज्य कवि कल्हण ने अपनी पुस्तक राज तरंगिणी में सम्राट मिहिर भोज का उल्लेख किया है.

प्रारम्भ से लेकर अंत तक उनका जीवन बहुत संघर्षपूर्ण रहा. उन्होंने अपना जीवन अश्व के पीठ पर रण में ही बिताया. अरबी, तुर्की मुसलमानो ने अपने इतिहास में उन्हें अपना सबसे बड़ा दुश्मन कहा है. मिहिर भोज के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने मुसलमानो को केवल 5 गुफाओं (क्षेत्रों) तक सीमित कर दिया था. यह वही समय था, जिस समय मुसलमान किसी युद्ध मे केवल जीत हासिल करते थे और वहां की प्रजा को मुसलमान बना देते थे पर भारत के इस वीर क्षत्रिय सम्राट मिहिर भोज के नाम से अरबी, तुर्की आक्रान्ताओं के दिल दहल जाते थे.

उन्होंने करीब नौ लाख की केन्द्रीय अश्वारोही सेना गठित की. सामंतों का दमन कर उन्हें उनका मूल कर्तव्य याद दिलाया और अपने पूर्वज नागभट्ट प्रथम व द्वितीय की आक्रामक नीति को और भीषण रूप से लागू कर उन्होंने सिंध पर आक्रमण किया और मुस्लिम आक्रमणकारियों का भयानक संहार किया. परंतु स्थानीय हिंदू आबादी के नरसंहार की धमकी और मुल्तान के मंदिर और पुजारियों के कत्ल की भावनात्मक कपटजाल के कारण अरबों को कर देने की शर्त पर जीवन दान दे दिया.

उन्होंने हिंदू मानकों के अनुरूप ऐसा सुसंगठित प्रशासन स्थापित किया कि उनके राज में चोरी डकैती और अपराध नहीं होते थे. संपन्नता इतनी ज्यादा थी कि आम नागरिक भी दैनिक जीवन में खर्च के लिये चांदी और सोने की मुद्रायें प्रयोग करते थे.अरब यात्री सुलेमान ने अपनी पुस्तक सिलसिला-उत-तारिका में लिखा है कि सम्राट मिहिर भोज के पास उंटों, घोड़ों और हाथियों की बड़ी विशाल और सर्वश्रेष्ठ सेना है.  उनके राज्य में व्यापार सोने और चांदी के सिक्कों से होता है.  इनके राज्य में चोरों डाकुओं का भय नहीं होता था.

मिहिर भोज के राज्य की सीमाएं उत्तर में कश्मीर से दक्षिण में कर्नाटक, आंध्रप्रदेश की सीमा तक, पूर्व में असम, उत्तरी बंगाल से लेकर पश्चिम में काबुल तक विस्तृत थी.  915 ईस्वी में भारत भ्रमण पर आये बगदाद के इतिहासकार अल मसूदी ने भी अपनी किताब मिराजुल-जहाब में लिखा कि सम्राट मिहिर भोज के पास महाशक्तिशाली, महापराक्रमी सेना है. इस सेना की संख्या चारों दिशाओं में लाखो में बताई गई है.

ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार मिहिर भोज की एक सेना कनकपाल परमार के नेतृत्व में गढ़वाल नेपाल के राघवदेव की तिब्बत के आक्रमणों से रक्षा करती थी.  इसी प्रकार एक सेना अल्कान देव के नेतृत्व में पंजाब के गुर्जराज नगर के समीप नियुक्त थी जो काबुल के ललियाशाही राजाओं को तुर्किस्तान की तरफ से होने वाले आक्रमणों से रक्षा करती थी.  इसकी पश्चिम की सेना मुलतान के मुसलमान शासक पर नियंत्रण करती थी. परंतु मिहिर भोज का वह वास्तविक कार्य अभी भी शेष था जिसे मुस्लिम और वामपंथी इतिहासकार छिपाते आये हैं.

मिहिर भोज का ध्यान उस समस्या पर गया जिसके हल के बारे में उनकी सोच अपने समय से 1000 वर्ष आगे की थी. यह समस्या थी भारत में अरबों के अभियान के फलस्वरूप बलात धर्मांतरित हुए हिन्दुओं की बडी संख्या. अपने ही बंधुओं से तिरस्कृत ये नवमुसलमान अपने ही देश में विदेशी अरब बनते जा रहे थे और अरबी, तुर्की आक्रमण में मुस्लिम आक्रांताओं का साथ देने के लिये विवश थे. इस्लाम के फैलाव की इस प्रवृत्ति से पूर्णपरिचित मिहिर भोज ने इसका कठोर स्थाई हल निकाला उनकी दृढ़ता के आगे ब्राह्मणों की कट्टरता इसबार आवाज नहीं उठा सकी जैसा की पहले हुआ था. उन्होंने जबरन धर्मांतरित हिंदुओं को पुनः हिन्दू धर्म में वापसी का विकल्प दिया.

अधिकांश धर्मान्तरित हिन्दुओं ने स्वेच्छा से ही “चंद्रायण व्रत” द्वारा प्रायश्चित्त कर वापस हिंदू धर्म ग्रहण कर लिया, यहाँ तक कि बलत्कृत और अपह्रत स्त्रियों को भी चंद्रायण व्रत द्वारा पूर्ण पवित्र घोषित कर उनका सम्मान लौटाया गया. उनके इस सफल प्रयास से भारत अगले 150 वर्षों तक “बाहरी और भीतरी” इस्लामी आक्रमण से मुक्त रहा. दुर्भाग्य से परवर्ती हिन्दू राजाओं ने इनके इस कुशल नीति का अनुसरण नहीं किया जिसके कारण भारत का इस्लामीकरण होता चला गया.

सम्राट मिहिर भोज भगवान विष्णु और महादेव के परमभक्त थे. उन्होंने आदि वराह की उपाधि धारण की थी. वह उज्जैन में स्थापित भगवान महाकाल के भी अनन्य भक्त थे. उनकी सेना जय महादेव, जय विष्णु, जय महाकाल की ललकार के साथ रणक्षेत्र में दुश्मन का खात्मा कर देती थी.  उन्होंने कई भवन और मन्दिर का निर्माण करवाया था. राजधानी कन्नौज में 7 किले और दस हजार मंदिर थे. उनके द्वारा बनाये गये मन्दिर आज भी मौजूद है जैसे ओरछा का चतुर्भुज मन्दिर, ग्वालियर का तेली का मन्दिर, गुजरात के त्रिनेत्रेश्वर मन्दिर, चम्बल का बटेश्वर मंदिर आदि.

प्रमुख स्त्रोत:

  1. श्रेण्य युग-आर . सी. मजूमदार
  2. प्राचीन भारत का राजनैतिक और सांस्कृतिक इतिहास-डॉ. विमलचंद्र पांडे
  3. प्रतिहारों का मूल इतिहास लेखक-देवी सिंह मंडावा
  4. विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का इतिहास लेखक-डा अनुपम सिंह
  5. ग्वालियर अभिलेख आदि
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