Ketan Agarwal Murder/ Pune : The Nation moved with brutal cold blooded murder incident of Ketan Vishal Agarwal a 26 years old Pune resident where the mastermind killers was his own 20 year old fiancee Siya Goel and her lover chetan chawdhary. A shocking high profile murder raises a thousand questions on changing psychology of today’s youth. Hard to accept but real. Chief Editor- Divya Sharma
आसमानी रिश्तों की बदलती हक़ीकत : कहते हैं जोड़ियां आसमानों में तय होती हैं और मर्डर ज़मीन पर।
पिछले कुछ वर्ष ऐसी घटनाएं ले कर आये जिन्होंने समाज में हो रहे भयानक बदलावों को बेनकाब कर के रख दिया। देश सकते में हैं। रिश्ते सहमे हुए हैं। प्यार, विवाह, विश्वास, भरोसा, साथ, संजोग, शुभता, सौभाग्य, सरलता, सत्य, की नींव पर बनने वाले पवित्रतम रिश्तों की बुनियाद हिल चुकी हैं अब शादी विवाह जैसे रिश्ते एक शुद्ध व्यावसायिक कॉन्ट्रैक्ट भर हैं जहाँ फायदा वहाँ रिश्ता। बेलगाम कुत्सित इच्छाएं, आज़ादी, लालच और भोग विलास का पागलपन युवाओं के सिर पर चढ़ा ऐसा जिन्न, ऐसा असेब बन चुका है जिसका उतारा संभव नहीं जान पड़ता। बहुत मॉडर्न ख्यालात वाले परिवारों के फर्द अपनी पसंद से ज़रा सा कुछ अलग मिलने पर ही हत्या करते फिर रहे हैं किसी की औलाद की जान, उसका मुकाम, परिवार, रिश्ते, कानून इन ज़हनी मरीजों के लिए मौजूद ही नहीं है। और देखिए इन सफेदपोश हत्यारों को जमानत तक कितनी आसानी से मिल जाती है।

प्रेम या वहशीपन
हत्यारी सोनम , सिया से पूछना है कि तुमने जिंदगी में अपनी चप्पल तक अपनी पसंद की खरीदी थी अभी तक तो परिवार का चुना गया वर पसंद ना आने पर मना क्यों ना कर दिया। क्या ना कहना इतना मुश्किल होता है। वो शादी जो तुम्हारे मुताबिक तुम पर थोपी जा रही थी तो निर्दोष राजा और केतन की हत्या की बजाय, शादी थोपने वाले अपने परिवार की हत्या क्यों ना कर दी। अपने प्रेमियों की आशिक़ी इतनी सिर पर चढ़ी थी तो दोनों लैला मजनू जोड़े ने आत्महत्या क्यों ना कर ली। क्यों खुद को दर्दनाक खौफनाक मौत से नहीं बक्शा। ये हत्यारी जोड़िया ना सिर्फ जिंदा रहीं बल्कि जघन्य हत्याएं करके मासूम बन सूकून से नींद भर सोई भी, पेट भर खाया भी, क्योंकि जो किया उस पर पछतावा नहीं था, अपराधबोध नहीं था। इन दरिंदों की चालाकी की कोई थाह नहीं है ।

हैरानी है इनके परिवार पर जो अब भी इनके साथ खड़े हैं इनको घर में रखे हुए हैं बचाव की कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं क्योंकि हत्यारी नशेड़ी चरित्रहीन बिटिया भोली है मासूम है जिसने कल ही दुनिया में आँख खोली है। दिखे वो लालची गिद्ध वकील इन हत्यारी जोड़ियों के बचाव केस लपकने को लार टपकाते जिनका आत्मसम्मान इंसानियत मर चुकी है। सोनम के मामले में तो न्यायपालिका ने इतनी उदारता दिखाई है कि साल भी पूरा नहीं हुआ और सब हत्यारे बेल पर छूट कर मौज में खुले घूम रहे हैं जिन्हें पुलिस की लचर चार्ज शीट के आधार पर छोड़ा गया है। जय हो भारत की न्याय, पुलिस व्यवस्था। पर समाज और परिवार का क्या? उनकी जिम्मेदारी और कर्तव्य क्या हुए। थोड़ा समझते हैं ।
भरोसे के रिश्तों के कत्ल से कांपता समाज
पुणे के लोहगढ़ किले की ऊंची पहाड़ी से मंगेतर केतन अग्रवाल को धक्का देकर हत्या करने के आरोप में सिया गोयल की गिरफ्तारी ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इससे पहले मेघालय में इंदौर के राजा रघुवंशी की हनीमून के दौरान कथित तौर पर पत्नी सोनम रघुवंशी द्वारा प्रेमी के साथ मिलकर की गई हत्या की घटना ने भी समाज को स्तब्ध किया था। ये घटनाएं केवल अपराध की श्रेणी में रखकर भुला देने योग्य नहीं हैं। ये उन मूल्यों, विश्वासों और रिश्तों की बुनियाद पर गहरा आघात हैं, जिन पर भारतीय समाज सदियों से खड़ा रहा है। भारतीय संस्कृति में विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि दो परिवारों, दो संस्कृतियों और दो जीवन-दृष्टियों का मिलन माना गया है। विवाह को सात जन्मों का बंधन कहा गया है। ऐसे में यदि कोई पति, पत्नी, मंगेतर या प्रेमी एक-दूसरे को जीवन का साथी मानने के बजाय बाधा और कांटा समझने लगे, तो यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के संकट का संकेत है।

किशोर अवस्था से यौवन की ओर कदम बढ़ाती लड़किया कई बार अभिभावकों की खुली छूट या माडर्न बिंदास जीवन शैली के भ्रम में गलत रास्ते पर चली जाती है और प्रेमियों पर भरोसा कर अंतरग पल बिता लेती है यही से इनके चालाक और रईसजादी बीबी पाने का मन बना चुके आशिक इनके अंतरंग पलो के फोटो और वीडियो कैप्चर कर स्टोर कर लेते हैं ऐसी लड़किया प्रेमियों के ईशारे और सहयोग से मंगेतर को ही पहाड़ी से धकेल कर मारने का अक्षम्य अपराध कर जाती है। इस मामले की तह तक पड़ताल कर सारे षडयंत्र को बुनने वाले चेतन बाबूलाल, सिया गोयल का नारको टैस्ट होना चाहिए दोनों को फास्ट कोर्ट में सुनवाई कर फांसी की सजा होनी चाहिए। अभिभावकों को नकेल कस कर उनके अनुसार विवाह का निर्णय लेना चाहिए ताकि कोई राजा रघुवंशी या केतन विशाल अग्रवाल किसी नागिन के मंगेतर होने की कीमत जान से न चुकाए।

राजा रघुवंशी और केतन अग्रवाल जैसे मामलों में सबसे अधिक विचलित करने वाला पक्ष यह है कि हत्याएं उन लोगों ने कीं, जिन पर सबसे अधिक विश्वास किया गया था। विश्वास का यह टूटना ही समाज को भयभीत करता है। किसी भी सभ्यता की शक्ति उसकी सैन्य या आर्थिक ताकत नहीं, बल्कि उसके रिश्तों में निहित भरोसा होता है। जब यह भरोसा टूटने लगता है, तब समाज भीतर से कमजोर होने लगता है। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यदि कोई युवती या युवक किसी रिश्ते से संतुष्ट नहीं है, तो क्या उसके सामने ‘ना’ कहने का विकल्प नहीं था? आधुनिक समाज ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को पर्याप्त स्थान दिया है। सगाई तोड़ना, विवाह से इनकार करना, आपसी सहमति से अलग होना-ये सभी वैधानिक और सामाजिक विकल्प उपलब्ध हैं। फिर हत्या जैसी भयावह मानसिकता क्यों जन्म ले रही है?

इस प्रश्न का उत्तर केवल कानून या पुलिस के पास नहीं है। इसके लिए समाजशास्त्रियों, मनोवैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, धर्माचार्यों और परिवार संस्थाओं को मिलकर मंथन करना होगा। आज का युवा एक ऐसे संक्रमणकाल से गुजर रहा है, जहां पारंपरिक मूल्य और आधुनिक जीवनशैली के बीच गहरा द्वंद्व मौजूद है। एक ओर परिवार की अपेक्षाएं हैं, दूसरी ओर व्यक्तिगत इच्छाएं। संवाद के अभाव में यह द्वंद्व कई बार मानसिक तनाव, विद्रोह और हिंसा का रूप ले लेता है। पिछले कुछ वर्षों में देश ने श्रद्धा वालकर हत्याकांड, निक्की यादव हत्याकांड, बेंगलुरु, दिल्ली और अन्य महानगरों में प्रेम-संबंधों से जुड़े अनेक जघन्य अपराध देखे हैं। इन घटनाओं ने स्पष्ट किया है कि प्रेम, विवाह और संबंधों को लेकर समाज में गहरी अस्थिरता एवं अविश्वास बढ़ रहा है। यह अस्थिरता केवल स्त्री या पुरुष तक सीमित नहीं है, दोनों पक्षों में हिंसक प्रवृत्तियां दिखाई दे रही हैं।

मोबाइल संस्कृति और डिजिटल संसार ने इस संकट को और जटिल बनाया है। मोबाइल फोन, जो कभी दूरियों को समाप्त करने का माध्यम था, आज अनेक मामलों में षडयंत्र, छल और अपराध का साधन बनता जा रहा है। सोशल मीडिया ने तुलना, उपभोगवाद, त्वरित सुख और आभासी संबंधों को बढ़ावा दिया है। डिजिटल दुनिया में बने रिश्ते कई बार वास्तविक जीवन की जिम्मेदारियों और मर्यादाओं से कटे होते हैं। परिणामस्वरूप धैर्य, सहनशीलता और त्याग जैसी पारिवारिक जीवन की आवश्यक विशेषताएं कमजोर पड़ रही हैं।
एक अन्य गंभीर पक्ष सांप्रदायिक अविश्वास और तथाकथित ‘लव जिहाद’ जैसे विवादों के संदर्भ में भी सामने आता है। जब प्रेम, विवाह या संबंधों का उपयोग छल, पहचान छिपाने, धार्मिक परिवर्तन, आर्थिक शोषण अथवा भावनात्मक उत्पीड़न के लिए किया जाता है, तब केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि समुदायों के बीच विश्वास का भी हनन होता है। यह आवश्यक है कि किसी भी प्रकार के संबंध पारदर्शिता, स्वेच्छा, समानता और ईमानदारी पर आधारित हों। पहचान छिपाकर, धोखे से अथवा किसी वैचारिक एजेंडे के तहत बनाए गए संबंध सामाजिक सौहार्द को चोट पहुंचाते हैं।

लेकिन इस विषय पर संतुलित दृष्टिकोण भी आवश्यक है। कुछ घटनाओं के आधार पर किसी सम्पूर्ण समुदाय को दोषी ठहराना न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि सामाजिक सद्भाव के लिए भी घातक है। भारत की शक्ति उसकी विविधता और सांप्रदायिक सौहार्द में निहित है। सदियों से विभिन्न धर्मों, जातियों और संस्कृतियों के लोग यहां पारस्परिक सम्मान और विश्वास के आधार पर साथ रहते आए हैं। अतः किसी भी अपराध को अपराधी की व्यक्तिगत जिम्मेदारी के रूप में देखना चाहिए, न कि पूरे समुदाय की पहचान के रूप में। हमें प्रेम के नाम पर छल का विरोध करना चाहिए, लेकिन साथ ही सामाजिक सौहार्द और मानवीय एकता को भी अक्षुण्ण रखना होगा। आज सबसे बड़ी चुनौती परिवार संस्था को पुनः सशक्त बनाने की है। संयुक्त परिवारों के विघटन, महानगरीय जीवन, एकाकीपन और अत्यधिक व्यस्तता ने परिवार के भीतर संवाद को कम कर दिया है। माता-पिता और बच्चों के बीच संवादहीनता बढ़ रही है। बच्चों को भौतिक सुविधाएं तो मिल रही हैं, लेकिन भावनात्मक सुरक्षा और मूल्यपरक संस्कार कम होते जा रहे हैं।

विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में केवल रोजगारपरक शिक्षा पर्याप्त नहीं है। वहां जीवन-कौशल, नैतिक शिक्षा, भावनात्मक संतुलन, संबंध प्रबंधन और पारिवारिक मूल्यों पर भी गंभीर कार्य होना चाहिए। युवा पीढ़ी को यह समझाना होगा कि प्रेम का अर्थ अधिकार नहीं-उत्तरदायित्व है, संबंध का अर्थ उपभोग नहीं-समर्पण है और मतभेद का समाधान हिंसा नहीं-संवाद है। धर्म और आध्यात्मिक संस्थाओं की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सभी धर्म प्रेम, करुणा, सत्य, अहिंसा और सह-अस्तित्व का संदेश देते हैं। यदि धार्मिक संस्थाएं युवा पीढ़ी को मानवीय मूल्यों, आत्मसंयम और संवाद की संस्कृति से जोड़ें, तो अनेक सामाजिक विकृतियों को रोका जा सकता है। आचार्य तुलसी, आचार्य महाप्रज्ञ, महात्मा गांधी और स्वामी विवेकानंद जैसे चिंतकों ने सदैव चरित्र, नैतिकता और आत्मानुशासन को समाज की आधारशिला माना।

पुणे और मेघालय की घटनाओं ने हमें चेतावनी दी है कि यदि हम अभी नहीं चेते, तो रिश्तों का संकट और गहरा सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम परिवार, समाज और राष्ट्र-तीनों स्तरों पर विश्वास की पुनर्स्थापना का अभियान चलाएं। परिवारों में संवाद बढ़े, युवाओं को निर्णय की स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी का बोध कराया जाए, डिजिटल संस्कृति पर संयम हो और सामाजिक-सांप्रदायिक सौहार्द को मजबूत बनाया जाए। सभ्यता की पहचान ऊंची इमारतों, तकनीकी प्रगति और आर्थिक समृद्धि से नहीं होतीय उसकी पहचान इस बात से होती है कि वहां लोग एक-दूसरे पर कितना भरोसा करते हैं। यदि भरोसा टूट गया, तो समाज की आत्मा घायल हो जाएगी। इसलिए आज का सबसे बड़ा राष्ट्रीय दायित्व है-रिश्तों के भरोसे को बचाना, मानवीय संवेदनाओं को पुनर्जीवित करना और प्रेम, विश्वास तथा सौहार्द की उस परंपरा को मजबूत करना, जिसने भारतीय समाज को सदियों से जीवंत बनाए रखा है।
आज भारतीय समाज जिस संक्रमणकाल से गुजर रहा है, उसमें रिश्तों का संकट केवल पति-पत्नी अथवा प्रेम-संबंधों तक सीमित नहीं रह गया है। एक ओर पुणे और मेघालय जैसी घटनाएं भरोसे के रिश्तों की हत्या कर रही हैं, तो दूसरी ओर प्रशासनिक लापरवाही के कारण अस्पतालों, स्कूलों और सार्वजनिक स्थलों पर आगजनी एवं दुर्घटनाओं में मासूमों की मौतें व्यवस्था के प्रति जनता के विश्वास को तोड़ रही हैं। सांप्रदायिक तनाव, धार्मिक कट्टरता, पहचान छिपाकर बनाए जाने वाले संबंध, प्रेम के नाम पर छल और शोषण जैसी घटनाएं भी सामाजिक सौहार्द की नींव को कमजोर कर रही हैं।

भौतिकता, उपभोक्तावाद और अंधी प्रतिस्पर्धा की आंधी ने संयम, सादगी, त्याग और पारिवारिक मर्यादाओं जैसे जीवन-मूल्यों को हाशिए पर धकेल दिया है। वहीं नशे का बढ़ता प्रचलन, शराब और मादक पदार्थों की लत युवा पीढ़ी को परिवार और समाज से काटकर हिंसा, अपराध और संवेदनहीनता की ओर ले जा रही है। जब समाज में व्यक्ति अपने स्वार्थ, वासना और तात्कालिक सुख को ही सर्वोच्च मानने लगे, तब रिश्ते साधना नहीं, सौदे बन जाते हैं। ऐसी स्थिति में आवश्यक है कि परिवार, शिक्षा, धर्म, मीडिया और शासन-सभी मिलकर मानवीय मूल्यों, पारदर्शिता, संवाद, नैतिकता और पारस्परिक सम्मान की संस्कृति को पुनर्जीवित करें। क्योंकि यदि मानवीय रिश्तों की बुनियाद ही हिल गई, तो न केवल परिवार टूटेंगे, बल्कि सामाजिक सौहार्द, राष्ट्रीय एकता और सभ्यता का पूरा ढांचा भी संकट में पड़ जाएगा।
स्वछंद जीवन शैली से बहकते कदम से सिया, सोनम और मुस्कान की श्रृंखला
पुणे में घटित केतन विशाल अग्रवाल हत्याकांड ने एक बार फिर भारतीय समाज की उन परतों को उधेड़ दिया हैजिसे जान कर भी मानने से इंकार किया जा रहा हैं, क्योंकि हमें आदर्शवादी समाज का दिखावा बनाए रखना है। असीम संभावनाओं से भरे 26 साल के केतन अग्रवाल की हत्या उनकी मंगेतर सिया गोयल ने अपने प्रेमी चेतन चौधरी के साथ मिलकर कर दी। पुणे के पास लोहागढ़ के किले में ट्रेकिंग के बहाने सिया केतन को ले गई, उससे पहले अपने जन्मदिन का जश्न केतन के साथ मनाया और बाकायदा सोशल मीडिया पर उसे डाला भी। उन वीडियो को देखकर जरा सा अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि इस दौरान कितनी भयावह योजना उसके दिमाग में चल रही होगी।

लोहागढ़ किले में जब केतन और सिया पहुंचे तो उनके साथ-साथ चेतन चौधरी भी पहुंचा, जिसके साथ मिलकर सिया ने केतन को ऊंचाई से धक्का दे दिया। इसके बाद सोशल मीडिया पर फिर पोस्ट डाली कि जन्मदिन पर तुम मुझे छोड़ कर चले गए। पहले पहल इसे सामान्य दुर्घटना मानकर सिया के लिए ही सबकी सहानुभूति उमड़ी कि नवंबर में इनकी शादी होनी थी, जिसके लिए दोनों परिवार जमकर तैयारी कर रहे थे। जयपुर में शाही अंदाज में शादी करवाने के लिए 17 करोड़ रूपयों में एक महल भी बुक करवा लिया गया था, लेकिन उससे पहले इतना बुरा हादसा हो गया। पुलिस ने जब इस दुर्घटना की जांच शुरु की तो कुछ अजीबोगरीब संयोगों पर नजर गई, जैसे शादी से पहले की फोटोग्राफी करवाने के लिए यह जोड़ा बाली जाने वाला था, और एक दिन पहले केतन का पासपोर्ट अचानक गुम हो गया।
14 जून को भी सिया और केतन लोहागढ़ ट्रेक पर गए थे, जहां केतन को सिया ने धक्का दिया था और उसने झाड़ी पकड़कर खुद को बचाया था, तब सिया ने कहा था कि उसने सांप देखा और केतन की जान बचाने के लिए घबराहट में उसे धक्का दिया। लेकिन 18 जून को जब यह जोड़ा फिर से लोहागढ़ ट्रेक पहुंचा तो इस बार उनके करीब ही एक युवक सर्दियों में पहने जाने वाली हुडी को पहना हुआ था और उसका चेहरा छिपा था, जबकि पुणे में अभी गर्मी ही है। पुलिस ने जब इन सारे तथ्यों की गहराई से पड़ताल की तो यह समझने में वक्त नहीं लगा कि यह सामान्य हादसा नहीं बल्कि सोची-समझी साजिश के तहत की गई हत्या थी।

अब सिया पुलिस की गिरफ्त में है, केतन के घरवाले स्वाभाविक तौर पर उसके लिए कड़ी से कड़ी सजा की मांग कर रहे हैं। उनका एक ही सवाल है कि अगर किसी और से प्यार था और केतन से शादी नहीं करनी थी, तो पहले ही अपने घरवालों को मना कर देना था, इसके लिए हमारे बेटे को मारने की क्या जरूरत थी। ठीक ऐसा ही सवाल पिछले साल मेघालय में क्रूरता से मारे गए राजा रघुवंशी के घर वाले भी पूछ रहे थे। जब राजा से शादी करने के चंद दिनों बाद सोनम ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर उनकी हत्या कर दी थी। असल में इन्हें प्रेमी या प्रेमिका कहना प्रेम जैसे पवित्र भाव का अपमान करने जैसा है, ये अपराध में भागीदार होते हैं, इससे ज्यादा इन्हें और कुछ नहीं कहा जा सकता। ये वासना के सने कीड़े है।
बहरहाल, इंदौर से लेकर पुणे तक अपने जीवनसाथी को मारने की घटनाएं समाज में बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति को तो दिखाती ही हैं, साथ ही यह संकेत भी देती हैं कि एक परंपरागत लीक पर समाज को चलाने की कोशिश कई बार कितने भयावह परिणाम लाती है। न जाने क्यों भारतीय समाज में अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने या किसी से प्यार करने के बाद शादी करने को अभी भी समाज घटिया या हिकारत से देखता है। आज के दौर में भी बहुत से अभिभावक यह कहने से हिचकते हैं कि उनकी बेटी या बेटे ने अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुना है।
पितृसत्तात्मक समाज बेटे की पसंद को एक बार सहजता से स्वीकार कर भी ले, लेकिन अधिकतर घरों में बेटियां खुलकर जीवनसाथी के लिए अपनी मर्जी का इजहार कर ही नहीं पाती हैं। अगर करें तो उसे या तो पाश्चात्य संस्कृति का दुष्प्रभाव बताया जाता है, या फिर निर्लज्जता की श्रेणी में डाला जाता है। शायद इसी वजह से कई बार सही राह पर चलकर अपनी मर्जी बताने की जगह हत्या करने जैसा आपराधिक कदम उठाया जाता है, जिसकी कोई माफी नहीं दी जा सकती। जो इंसान किसी दूसरे की जान लेने जैसा अतिरेक भरा कदम उठा सकता है, वो इतनी हिम्मत क्यों नहीं जुटा पाता कि शादी के लिए अपनी मर्जी बताए या मां-बाप के दबाव को मानने से इंकार करे।
सिया गोयल और सोनम रघुवंशी दोनों को यदि सामाजिक दायरे में पर्याप्त परिवारिक नियंत्रण और मर्यादा में रहकर जीने का विचार दिया जाता तो वह किसी आशिक के जाल में फंस कर अपराध की ओर अग्रसर नही होती। या फिर उन्हें अपने पसंद के लड़कों से शादी करनी थी या मां-बाप की मर्जी से शादी नहीं करनी थी, तो वे पहले बता सकती थीं, इससे घर बर्बाद नहीं होते, न ही विवाह जैसी संस्था से भरोसा उठता। मगर इन्होंने गलत राह चुनी। हालांकि इनके कारण केवल लड़कियों पर सवाल उठाने से इस गंभीर समस्या का समाधान नहीं मिलेगा।
अभी बीते दिनों नोएडा से लेकर भोपाल कलकत्ता से लेकर देहरादून तक दहेज हत्याओं या ससुराल में मिली प्रताड़ना के कारण हुई मौतों के मामले सामने आए, जिनमें नवयुवतियों की जिंदगी बर्बाद हुई और उनके मां-बाप जिंदगी भर का दुख अब उठा रहे हैं। लेकिन एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि विवाह से पहले स्वतंत्र स्वछंद जीवन जीने का मन बना चुकी लड़कियों को ससुराल की बंदिश और मर्यादा में रहकर जीना स्वीकार नहीं है जिस कारण वह कई बार आत्महत्या कर ससुराल वालों को दहेज हत्या व उत्पीड़न के अपराध में फंसा जातीं हैं। इस सबका जिम्मेदार विवाह पूर्व के अफेयर स्वछंद जीवन शैली होता है। विवाह से पहले यौन शुचिता का विचार भी नष्ट हो रहा है कुछ लोग इसे स्वीकार नहीं कर पाते हैं और दाम्पत्य में तनाव पैदा हो जाते हैं।
आदर्शवादी समाज होने के लिए अब बदलते माहौल की हकीकत को समझना और स्वीकार करना शुरु करना चाहिए। भोपाल, नोएडा, इंदौर, पुणे में घटी घटनाएं केवल अपराधकथाएं नहीं हैं, ये समाज के लिए एक चेतावनी हैं, जिन्हें सुनकर जागने की जरूरत है या तो माडर्न जीवन से पैदा संक्रमण को स्वीकार किजिए या बच्चों को जन्म से ही मर्यादा में रहकर जीवन जीने के लिए संस्कार दीजिए।
Divya ji aap ka ye lakh padh ker bhut sari sei zankare mili kash aaj kal ke bache sabhi ke zindagi ke ahmiyat samaze thankyou so much for giving the good information