Royal Roots, Creative Vision: Princess Nandini Singh / प्रिंसेस नंदिनी सिंह: जनजातीय कला की सशक्त संरक्षक
विरासत से सृजन तक: प्रिंसेस नंदिनी सिंह की प्रेरणादायक कहानी

भारत के प्रतिष्ठित राज परिवारों में झाबुआ राज परिवार एक विशिष्ट स्थान रखता है। जिन्होंने अपने सैंकड़ों वर्षों के शासन काल में पूरे क्षेत्र का समग्र विकास किया विशेष रूप से शिक्षा, धर्म, स्वास्थ्य, चिकित्सा, वाणिज्य और व्यापार के अलावा झाबुआ राज परिवार ने संभाला, राज्य और भारत की सांस्कृतिक विरासत को।

समकालीन शासकों का स्थानीय आदिवासी कला, वस्तु, हस्तशिल्प, पकवान, कला के प्रति लगाव इतना गहरा था कि 1584 से आज 2026 तक की हर पीढी ने इन्हें सहेजा सँवारा उनके विस्तार और प्रसार पर स्वयं ध्यान दिया है। इससे राज्य के उन गुमनाम कलाकारों को जीविका और सम्मान मिला जो अवसर और सही दाम ना मिलने से अपने हुनर को छोड़ रहे थे। विशेष रूप से गोंड चित्र।

The Creative Vision of Princess Nandini Singh of Jhabua
“गोंड चित्र” आर्ट का वो जगमगाता स्वरूप है जो प्रकृति, जंगल, जीव, जल, जीवन तत्व और सदियों से चली आ रहीं लोक कथाएं, local legends की पहेलियों के साथ मानव के भावनात्मक जुड़ाव की अनगिनत कहानी कहती हैं हर गोंड चित्र आपको एक ऐसी दुनिया से जोड़ता है जो बिल्कुल शुद्ध है सरल है शाश्वत है। हर चित्र अपने आप में अद्वितीय है”- नंदिनी सिंह झाबुआ

उन्होंने अपने प्रयासों से विश्व भर में सबसे बेहतरीन मीनारों, महलों में पहुंचा भारत की कला का परचम लहरा दिया है। और यह सब संभव हुआ एक असाधारण व्यक्तित्व नंदिनी सिंह जी के संकल्प से। जिन्होंने अमेरिका के अपने सुव्यवस्थित जीवन की बजाय अपनी मातृभूमि भारत को अपनी कर्मभूमि बनाया। मध्य प्रदेश राज्य के कला एवं संस्कृति की सेवा को चुना हालांकि नंदिनी सिंह जी का परिवार स्वतंत्रता के बाद से ही भारतीय राजनीति में सक्रिय रूप से पद प्रतिष्ठित है । झाबुआ रियासत की स्थापना 1584 ईस्वी में महाराजा केशवदास राठौड़ ने की थी। यह राजघराना मारवाड़ (जोधपुर) के राठौड़ राजवंश की एक शाखा माना जाता है। लगभग 364 वर्षों तक इस वंश ने झाबुआ पर शासन किया, जब तक कि 1948 में रियासत का भारतीय संघ में विलय नहीं हो गया।

महाराजा नरेन्द्र सिंह – वर्तमान पारिवारिक राज प्रमुख और युवराज कमलेन्द्र सिंह – उत्तराधिकारी हैं । झाबुआ का ऐतिहासिक राजवाड़ा पैलेस आज भी राजपरिवार की पहचान है। यह शहर की प्रमुख धरोहरों में गिना जाता है और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। झाबुआ रियासत को ब्रिटिश काल में 11 तोपों की सलामी प्राप्त थी। 15 जून 1948 को रियासत का भारत में विलय हुआ। झाबुआ का राजपरिवार मुख्य रूप से: राजवाड़ा और पारिवारिक विरासत के संरक्षण, धार्मिक एवं सामाजिक कार्यक्रमों, सांस्कृतिक आयोजनों, पर्यटन को बढ़ावा देने से जुड़ा रहा है।

किंतु नंदिनी सिंह जी विशेष रूप से भारतीय जनजातीय कला (Tribal Art), सांस्कृतिक विरासत संरक्षण, सामाजिक शिक्षा, विकास के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम कर रही हैं । क्षेत्र की विरासत, महिला कलाकारों और शिल्प पर केंद्रित एक विशेष पहल से भी जुड़ी रहीं। इस पहल में झाबुआ की सांस्कृतिक पहचान और स्थानीय कला को प्रमुखता दी गई है।

प्रदर्शनियों की प्रमुख थीम
गोंड और जनजातीय कला , झाबुआ की सांस्कृतिक विरासत, भारतीय शाही परंपराएँ, हस्तनिर्मित टेक्सटाइल,समकालीन कला और पारंपरिक शिल्प, महिला कारीगरों और स्थानीय कलाकारों का सशक्तिकरण
नंदिनी सिंह जी के प्रयत्नों का ही परिणाम है जो आज मध्य प्रदेश की जनजातीय कला , हस्तशिल्प विश्व के कलाप्रेमियों के व्यक्तिगत संग्रह और गलियारों की शोभा बन रहे हैं। आज विश्व कला के क्षेत्र में भी भारत की क्षमता , संस्कृति और हुनर को पहचानता है ।

नंदिनी सिंह जी के लिए यह उनकी विरासत है, सेवा और अपने लोगों के उत्थान के प्रति समर्पण है प्रतिबद्धता है जो उन्हें अपनी ज़मीन, संस्कारों और संस्कृति से जोड़े रखती है। यह कोई व्यवसाय नहीं है उनके पुरखों द्वारा सैंकड़ों वर्षों से चला आ रहा विधिवत् कला संरक्षण (Art Conservation) और सांस्कृतिक उद्यमिता (Cultural Entrepreneurship) के प्रामाणिक पैतृक इतिहास का विस्तार भर है। उनके चुने हर चित्र में पर्यावरण संरक्षण के प्रति समर्पण और जीवंत मनोभाव बताते हैं कि प्रकृति और मानव एक दूसरे के पूरक हैं। गोंड और अन्य जनजातीय कलाओं का संरक्षण। मध्य प्रदेश के आदिवासी कलाकारों के साथ काम। कलाकारों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंच दिलाने का प्रयास।कला प्रदर्शनियों और विरासत आयोजनों में भागीदारी।

गोंड कला के समृद्ध इतिहास, आदिवासी चित्रकला पैटर्न्स, हस्तशिल्प, पारंपरिक वस्त्र एवं शिल्प की प्राचीन एवं विशुद्ध तकनीकों को पुनर्जीवन और संरक्षण दिया जाए और उनके मूल स्वरूप को भी सुरक्षित बनाए रखा जाना चाहिए। युवा कलाकारों के लिए बाज़ार विकसित करना और पहचान दिलवाना जरूरी है तभी यह समृद्ध कला अपने वैभव को बनाए रख पाएगी। जिसके लिए यह स्वयं कलाकारों के संपर्क में रहती हैं पारंपरिक डिजाइंस में विविधता और नवीनता बनाए रखने के लिए वे नए आइडियाज़ भी शेयर करती हैं इनकी टीम विश्व स्तर पर काम कर रही है जिस से इस मुहिम से ज्यादा से ज्यादा आदिवासी कलाकारों को लाभ पहुंचे और वैश्विक कलाप्रेमियों को अफॉर्डेबल ऑथेंटिक ओरिजिनल गोंड आर्ट प्रोडक्ट्स मिल पाएं ।

प्रिंसेस नंदिनी सिंह (झाबुआ) कला की बारीकियां, रंग संयोजन, चित्र वास्तु, भाव अभिव्यक्ति और कलात्मक रुचि समझती हैं वो जानती हैं इस असाधारण कौशल क्षेत्र में फैली संभावनाओं को। और उनका लक्ष्य है भारत के जनजातीय युवाओं की क्षमता का पूर्ण विकास हो उन्हें फलने फूलने खिलने के अवसर मिलें ।

यही कारण है कि इनकी आर्ट एग्जिबिशंस का इंतजार आर्ट सर्किल में बेसब्री से किया जाता है।

सही मायनों में देखा जाए तो समय बदला, शासन बदल गए, सरकारें बदल गईं किंतु इनके राज परिवार ने और नंदिनी सिंह जी ने अपनी प्रजा का साथ और हाथ आज भी थाम रखा है।
