An insightful report on CJP’s political Anti Hindu, Anti national, Anti modi protest and Reality check of Sonam Wangchuk (his real image and following in the state and paid media narratives sold to the nation. “पेपर लीक के नाम पर राजनीति का प्रदर्शन नहीं चलेगा”
संसद मार्च की आड़ में विपक्ष का शक्ति प्रदर्शन और जनता के असली मुद्दों से भटकाने की कोशिश.
सोनम वांगचुक और सुर्खियों से आगे का सच
(मीडिया नैरेटिव बनाम जनसमर्थन: क्या किसी आंदोलन की वास्तविक ताकत कैमरों से तय होती है?)
दिल्ली के जंतर-मंतर से संसद तक निकाले गए तथाकथित “चलो संसद” मार्च ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या देश में हर आंदोलन वास्तव में जनहित के लिए होता है या फिर कुछ आंदोलन केवल राजनीतिक उद्देश्य साधने के लिए खड़े किए जाते हैं। सोनम वांगचुक के अनशन और कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में आयोजित इस प्रदर्शन को जिस तरह से आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के नेताओं ने खुलकर समर्थन दिया, उससे यह आंदोलन एक स्वतंत्र जनआंदोलन कम और विपक्षी दलों के राजनीतिक मंचन का प्रयास अधिक दिखाई दिया।

जंतर-मंतर से संसद तक मार्च निकालने की कोशिश के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की स्थिति बनी। प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेडिंग तोड़ने का प्रयास किया, कई लोग संसद मार्ग की ओर बढ़े और कुछ प्रदर्शनकारी मेट्रो स्टेशनों तक पहुंच गए, जहां नारेबाजी भी हुई। ऐसे समय में जब संसद का सत्र चल रहा हो और राजधानी में सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता हो, तब बिना अनुमति संसद की ओर मार्च निकालना स्वाभाविक रूप से कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बन जाता है। शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार संविधान देता है, लेकिन उसके साथ कानून का पालन करना भी उतना ही आवश्यक है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली बात यह रही कि मंच पर और प्रदर्शन में कांग्रेस तथा आम आदमी पार्टी के कई प्रमुख नेता मौजूद रहे। मनीष सिसोदिया, आतिशी, संजय सिंह और अन्य विपक्षी नेताओं की मौजूदगी ने यह संदेश दिया कि आंदोलन अब शिक्षा सुधार की मांग से आगे बढ़कर राजनीतिक रंग ले चुका है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि यह वास्तव में छात्रों का आंदोलन था तो फिर विपक्षी दलों की इतनी सक्रिय भूमिका क्यों दिखाई दी।
लोकतंत्र में किसी भी आंदोलन की सफलता का सबसे बड़ा आधार उसका वास्तविक जनसमर्थन होता है। कैमरों की चमक, सोशल मीडिया की ट्रेंडिंग सूची, यूट्यूब की लाखों व्यूज़ या टीवी चैनलों की लगातार बहसें किसी आंदोलन को चर्चा का विषय तो बना सकती हैं, लेकिन वे स्वयं जनमत का प्रमाण नहीं होतीं। इतिहास गवाह है कि अनेक ऐसे आंदोलन रहे जिन्हें मीडिया ने बहुत कम स्थान दिया, फिर भी वे समाज में व्यापक परिवर्तन का कारण बने। वहीं कुछ ऐसे आंदोलन भी रहे जो मीडिया में छाए रहे, लेकिन समाज में स्थायी आधार नहीं बना सके।

पिछले कुछ वर्षों में लद्दाख और वहां के पर्यावरण, संवैधानिक अधिकारों तथा स्थानीय प्रतिनिधित्व को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा हुई है। इस विमर्श में सोनम वांगचुक एक प्रमुख चेहरा बनकर उभरे। उन्होंने जलवायु परिवर्तन, हिमालयी पारिस्थितिकी, स्थानीय संस्कृति और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय मंच पर रखा। देशभर में अनेक लोगों ने उनके विचारों का समर्थन किया, जबकि दूसरी ओर ऐसे लोग भी हैं जो मानते हैं कि उनकी राष्ट्रीय पहचान और स्थानीय जनसमर्थन के बीच पर्याप्त अंतर है।
यही प्रश्न आज लोकतांत्रिक विमर्श के केंद्र में है—क्या किसी व्यक्ति की राष्ट्रीय लोकप्रियता ही उसके स्थानीय जनाधार का प्रमाण है? या फिर किसी आंदोलन की वास्तविक शक्ति उसके अपने समाज के विश्वास और भागीदारी से तय होती है?

हाल ही में लद्दाख के एक सामाजिक संगठन के पदाधिकारी से हुई बातचीत में यह मत सामने आया कि लद्दाख में सोनम वांगचुक के समर्थन में वैसी व्यापक जन-लहर नहीं दिखाई देती जैसी राष्ट्रीय मीडिया में प्रस्तुत की जाती है। यदि यह आकलन सही है, तो यह विचारणीय है कि राष्ट्रीय विमर्श और स्थानीय वास्तविकता के बीच इतना अंतर क्यों दिखाई देता है। साथ ही यह भी उतना ही आवश्यक है कि किसी एक संगठन या व्यक्ति की राय को पूरे लद्दाख की सामूहिक राय मान लेने से भी बचा जाए। लोकतंत्र में समाज बहुआयामी होता है और किसी भी क्षेत्र में अनेक मत, अनेक समूह और अनेक दृष्टिकोण मौजूद रहते हैं।
आज मीडिया का स्वरूप पहले जैसा नहीं रहा। पहले समाचारों का चयन संपादकीय विवेक से होता था, अब एल्गोरिद्म, क्लिक, व्यूज़ और ट्रेंड भी यह तय करने लगे हैं कि कौन-सा मुद्दा अधिक दिखाई देगा। परिणामस्वरूप कई बार किसी व्यक्ति की छवि उसके वास्तविक सामाजिक प्रभाव से कहीं अधिक बड़ी दिखाई देने लगती है। दूसरी ओर, कई ऐसे स्थानीय मुद्दे जो वास्तव में जनता के जीवन से जुड़े होते हैं, राष्ट्रीय विमर्श से गायब रहते हैं।

सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति का लोकतंत्रीकरण किया है, लेकिन इसके साथ ही उसने “नैरेटिव निर्माण” को भी नई गति दी है। कुछ मिनट का वीडियो, भावनात्मक अपील, प्रभावशाली संगीत और लगातार साझा किए जाने वाले संदेश किसी भी व्यक्ति को राष्ट्रीय पहचान दिला सकते हैं। किंतु लोकतंत्र केवल डिजिटल लोकप्रियता से नहीं चलता। लोकतंत्र का आधार वास्तविक समाज, वास्तविक नागरिक और वास्तविक जनभागीदारी है।

आज अनेक यूट्यूब चैनल स्वयं को स्वतंत्र पत्रकारिता का प्रतिनिधि बताते हैं। उनमें से कई उत्कृष्ट कार्य भी कर रहे हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो किसी वैचारिक, राजनीतिक या व्यावसायिक उद्देश्य से एकतरफा सामग्री प्रस्तुत करते हैं। ऐसे में दर्शकों के सामने चुनौती यह होती है कि वे सूचना और प्रचार के बीच अंतर कैसे करें। यदि कोई चैनल केवल एक ही पक्ष को दिखाए और दूसरे पक्ष की उपेक्षा करे, तो वह पत्रकारिता के मूल उद्देश्य से भटक जाता है।
इसी प्रकार मुख्यधारा का मीडिया भी कई बार व्यक्तियों को मुद्दों से बड़ा बना देता है। परिणाम यह होता है कि पर्यावरण, स्थानीय प्रशासन, रोजगार, शिक्षा, पर्यटन और सीमावर्ती क्षेत्रों की समस्याओं जैसे गंभीर विषय पीछे छूट जाते हैं और चर्चा केवल किसी एक चेहरे तक सीमित रह जाती है। लोकतंत्र में यह प्रवृत्ति स्वस्थ नहीं मानी जा सकती।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी आंदोलन की सफलता केवल उसके नेता की लोकप्रियता पर निर्भर नहीं करती। यदि स्थानीय समाज सक्रिय रूप से उसके साथ नहीं जुड़ता, तो आंदोलन की गति सीमित हो सकती है। वहीं यदि जनता व्यापक रूप से उसके साथ खड़ी हो, तो मीडिया चाहे जितना मौन रहे, आंदोलन अपनी दिशा स्वयं बना लेता है। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर अनेक सामाजिक आंदोलनों तक यही अनुभव सामने आया है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि मीडिया किसी भी आंदोलन का मूल्यांकन केवल उसके चर्चित चेहरे के आधार पर न करे। उसे यह भी देखना चाहिए कि उस आंदोलन से स्थानीय लोग कितनी संख्या में जुड़े हैं, उनके जीवन पर उसका क्या प्रभाव पड़ रहा है और उनके भीतर उसके प्रति कितना विश्वास है। इसी प्रकार किसी आंदोलन के आलोचकों को भी तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर अपनी बात रखनी चाहिए, न कि केवल भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के आधार पर।

लोकतंत्र में असहमति का अधिकार उतना ही महत्वपूर्ण है जितना समर्थन का। यदि कोई व्यक्ति सरकार की नीतियों की आलोचना करता है, तो उसे अपनी बात रखने का अधिकार है। उसी प्रकार यदि समाज का कोई वर्ग उसकी बात से असहमत है, तो उसे भी अपनी राय रखने का समान अधिकार है। लोकतांत्रिक परंपरा का अर्थ ही यही है कि विभिन्न मत सम्मानपूर्वक सामने आएँ और जनता स्वयं निर्णय करे।
लद्दाख जैसे संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र में विकास, पर्यावरण, सुरक्षा और स्थानीय पहचान के प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन विषयों पर गंभीर और तथ्याधारित चर्चा होनी चाहिए। यदि पूरा विमर्श केवल किसी एक व्यक्ति के समर्थन या विरोध तक सीमित हो जाए, तो वास्तविक समस्याएँ पीछे छूट जाती हैं। इससे न समाज का भला होता है और न ही लोकतंत्र का।

आज डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर किसी भी विषय को लेकर कुछ ही घंटों में राष्ट्रीय अभियान चलाया जा सकता है। हैशटैग ट्रेंड होने लगते हैं, वीडियो वायरल हो जाते हैं और यह भ्रम पैदा हो सकता है कि पूरा देश किसी एक मत पर सहमत है। किंतु वास्तविक जनमत का आकलन केवल डिजिटल गतिविधियों से नहीं किया जा सकता। गाँव, कस्बे, स्थानीय संस्थाएँ, नागरिक संगठन और जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी कहीं अधिक महत्वपूर्ण संकेतक हैं।
पत्रकारिता का मूल धर्म सत्ता से प्रश्न पूछना है, लेकिन उतना ही आवश्यक यह भी है कि वह आंदोलनों और उनके नेताओं से भी प्रश्न पूछे। यदि पत्रकारिता केवल किसी एक पक्ष की प्रवक्ता बन जाए, तो उसकी विश्वसनीयता कम हो जाती है। लोकतंत्र में मीडिया की सबसे बड़ी पूँजी उसकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता है।

आज आवश्यकता संतुलित विमर्श की है। किसी भी व्यक्ति को देवता बनाना भी उचित नहीं और बिना पर्याप्त तथ्यों के उसे पूरी तरह खारिज कर देना भी लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित नहीं है। व्यक्तियों से अधिक महत्वपूर्ण वे मुद्दे हैं जिनके लिए वे आवाज़ उठाते हैं। यदि मुद्दे सही हैं, तो उन पर चर्चा होनी चाहिए; यदि तर्क कमजोर हैं, तो उनकी आलोचना भी तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए।
अंततः लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता करती है। मीडिया केवल सूचना का माध्यम हो सकता है, निर्णय का स्थानापन्न नहीं। सोशल मीडिया किसी व्यक्ति को प्रसिद्ध बना सकता है, लेकिन स्थायी सम्मान वही प्राप्त करता है जिसे समाज का विश्वास मिलता है। इसलिए किसी भी आंदोलन का मूल्यांकन कैमरों की संख्या, व्यूज़, लाइक या ट्रेंडिंग हैशटैग से नहीं, बल्कि उसके वास्तविक जनाधार, स्थानीय सहभागिता, लोकतांत्रिक स्वीकार्यता और समाज पर पड़े प्रभाव से किया जाना चाहिए।

लोकतंत्र का भविष्य भी इसी संतुलन में सुरक्षित है—जहाँ मीडिया तथ्य प्रस्तुत करे, समाज विवेक से निर्णय ले और किसी भी व्यक्ति या आंदोलन का मूल्यांकन प्रचार नहीं, बल्कि प्रमाण और जनविश्वास के आधार पर किया जाए। यही स्वस्थ लोकतांत्रिक संस्कृति की पहचान है और यही पत्रकारिता का वास्तविक दायित्व भी।
पेपर लीक का मुद्दा निश्चित रूप से गंभीर है और किसी भी परीक्षा में अनियमितता होने पर दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था को विफल घोषित कर देना या हर परीक्षा को संदेह के घेरे में खड़ा कर देना उचित नहीं कहा जा सकता। लाखों विद्यार्थियों ने कठिन परिश्रम के बाद परीक्षाएं दीं और बड़ी संख्या में छात्रों ने उत्कृष्ट अंक प्राप्त कर अपनी मेहनत का प्रमाण दिया। ऐसे में यह कहना कि पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है, उन लाखों ईमानदार विद्यार्थियों की मेहनत का भी अपमान माना जा सकता है।
कांग्रेस और आम आदमी पार्टी लगातार शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठा रही हैं। लेकिन यह भी एक तथ्य है कि देश की शिक्षा व्यवस्था का बड़ा हिस्सा दशकों तक उन्हीं सरकारों के अधीन विकसित हुआ, जिनका नेतृत्व कांग्रेस ने किया। यदि आज विपक्ष शिक्षा सुधार की बात करता है तो उसे यह भी बताना चाहिए कि लंबे समय तक सत्ता में रहते हुए उसने कौन-सी ऐसी व्यवस्था विकसित की थी जिसने भविष्य की चुनौतियों का समाधान सुनिश्चित किया। केवल वर्तमान सरकार पर आरोप लगाना और अतीत की जिम्मेदारियों से दूरी बना लेना राजनीतिक सुविधा तो हो सकती है, लेकिन यह संतुलित दृष्टिकोण नहीं माना जा सकता।

यह भी देखने योग्य है कि इस पूरे आंदोलन में अभिजीत दीपके को प्रमुख चेहरा बनाया गया, लेकिन वास्तविक राजनीतिक समर्थन विपक्षी दलों की ओर से दिखाई दिया। इससे यह धारणा बनती है कि दीपके एक ऐसे चेहरे के रूप में सामने लाए गए हैं, जिसके माध्यम से विपक्ष अपनी राजनीतिक रणनीति को आगे बढ़ाना चाहता है। आंदोलन के पीछे वास्तविक शक्ति कौन है, इसका उत्तर प्रदर्शन में शामिल राजनीतिक दलों की सक्रियता स्वयं देती हुई प्रतीत होती है।
देश इस समय आधारभूत संरचना, डिजिटल प्रौद्योगिकी, रक्षा, अंतरिक्ष, परिवहन और वैश्विक कूटनीति जैसे अनेक क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका, आर्थिक विस्तार और विकास परियोजनाओं को दुनिया गंभीरता से देख रही है। ऐसे समय में यदि हर उपलब्धि के बीच लगातार असंतोष का माहौल तैयार करने का प्रयास हो, तो यह भी स्वाभाविक है कि उसके पीछे की राजनीति पर चर्चा होगी। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना आवश्यक है, लेकिन आलोचना तथ्यों और संतुलित दृष्टिकोण पर आधारित होनी चाहिए।

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आंदोलन का स्थान महत्वपूर्ण होता है, परंतु आंदोलन तभी प्रभावी होते हैं जब वे निष्पक्षता, तथ्यों और जनहित पर आधारित हों। यदि किसी आंदोलन का स्वरूप धीरे-धीरे राजनीतिक दलों के शक्ति प्रदर्शन में बदल जाए, तो उसके मूल उद्देश्य पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। संसद मार्च के दौरान जिस प्रकार विपक्षी दलों की सक्रिय भागीदारी सामने आई, उससे यह धारणा मजबूत हुई कि यह केवल शिक्षा सुधार का अभियान नहीं बल्कि केंद्र सरकार के खिलाफ राजनीतिक माहौल बनाने का प्रयास भी था।
लोकतंत्र में जनता अंतिम निर्णायक होती है। वह यह समझती है कि कौन-सा आंदोलन वास्तविक जनहित के लिए है और कौन-सा आंदोलन राजनीतिक लाभ के लिए। शिक्षा सुधार पर गंभीर चर्चा अवश्य होनी चाहिए, लेकिन उसके लिए रचनात्मक संवाद, संस्थागत सुधार और ठोस नीति आवश्यक है, न कि केवल सड़क पर राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन। देश के विद्यार्थियों का भविष्य किसी भी दल की राजनीति से ऊपर होना चाहिए और शिक्षा जैसे संवेदनशील विषय को केवल राजनीतिक संघर्ष का माध्यम बनाने से बचना चाहिए।